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Saturday, 25 January 2014

नक्सलबाड़ी का किसान संघर्ष और उसके सबक


राजेश त्यागी / २५.१.२०१४

नक्सलबाड़ी का किसान संघर्ष, भारत में माओवाद की पहली प्रयोगशाला थी, जिसने माओवाद और उसके ‘चीनी रास्ते’ के दिवालियापन को पूरी तरह उजागर करते हुए दिखा दिया कि चीन की क्रांति से माओवादियों ने जो निष्कर्ष निकाले थे, वे पूरी तरह गलत थे.

चीन में माओवाद का उदय और विकास, सीधे-सीधे १९२५-२७ की चीनी क्रांति में सर्वहारा के पराभव के साथ जुडा हुआ है, जिसे, स्टालिन द्वारा निर्देशित कोमिन्टर्न की बोगस नीतियों के चलते, चीनी सर्वहारा पर जबरन लाद दिया गया था.

स्तालिनवादी कोमिन्टर्न की ये नीतियां, चीन की राष्ट्रीय बूर्ज्वाजी के क्रान्तिकारी होने की झूठी मेन्शेविक परिकल्पना पर टिकी थीं. इन नीतियों ने १९२५-२७ की चीनी क्रांति में सर्वहारा को बाध्य किया कि वह अभूतपूर्व वीरता और बलिदानों के बल पर छीनी गई, राजनीतिक सत्ता, बूर्ज्वा कोमिनतांग के हवाले कर दे और उसके सामने आत्मसमर्पण करे, और इस तरह, बूर्ज्वा कोमिनतांग के पीछे बांधकर, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को उसकी निशक्त बांदी बना दिया. इसके चलते च्यांग काई शेक ने हजारों कम्युनिस्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं, युवाओं और मजदूरों का कत्लेआम करते हुए, चीनी सर्वहारा को बिलकुल किनारे लगा दिया और नंगे आतंक और दमन का राज कायम किया.