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Saturday, 5 April 2014

तेलंगाना का किसान विद्रोह और स्तालिनवादी सीपीआई

- राजेश त्यागी/ ५.४.२०१४

प्रतिक्रांतिकारी अपराधों की उस अनंत श्रृंखला में, जिसे बीती एक सदी में स्तालिनवादियों ने अंजाम दिया था, सदी के ठीक मध्य में उभरा तेलंगाना का किसान विद्रोह (१९४८-५१), एक महत्वपूर्ण कड़ी था.

पहले, निहत्थे युवाओं और किसानो को, ‘क्रान्तिकारी उभार’ के नाम पर, पूंजीवादी राज्य की सशस्त्र सेनाओं के सामने धकेलकर, और फिर संघर्ष को बीच मझधार में छोड़कर किनारा करने वाला सीपीआई का अवसरवादी नेतृत्व, सीधे स्टालिन के निर्देशों द्वारा संचालित था, जिसका एकमात्र लक्ष्य था- क्रेमलिन की राष्ट्रीय-ब्यूरोक्रेटिक सत्ता का हितसाधन.

तेलंगाना का दौर, ‘रणदिवे थीसिस’ से शुरू होता है जिसे सीपीआई की कलकत्ता कांग्रेस में पेश किया गया था. इस थीसिस ने १९४१ से १९४८ तक चली आई, पी.सी.जोशी के नेतृत्व वाली ‘जनयुद्ध थीसिस’ को उलट दिया था. पी.सी.जोशी की यह ‘जनयुद्ध थीसिस’, किसी भी रूप में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध, सर्वहारा और मेहनतकशों का युद्ध नहीं थी, बल्कि सोवियत संघ की प्रतिरक्षा के नाम पर ब्रिटिश शासन के पक्ष में पूर्ण समर्पण की नीति थी.