राजेश त्यागी/ १२.२.२०१५
‘भारत माता की जय’ और ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ के धुर विरोधी नारों के बीच खुद को संतुलित कर रही आम आदमी पार्टी (AAP) ने, दिल्ली के विधानसभा चुनावों में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है. ७० सीटों वाली विधानसभा में AAP को ६७ सीटें हासिल हुई हैं.
चुनावी नतीजों ने और सबके अतिरिक्त AAP नेताओं को भी आश्चर्य में डाल दिया. नतीजों पर टिप्पणी करते, AAP नेता केजरीवाल ने कहा, “नतीजे चौंकाने वाले हैं. मुझे डर भी लग रहा है और खुश भी हूँ”.
यह सफलता, एक ओर तो बुर्जुआ उदारवादी कांग्रेस के पतन और दूसरी ओर मतों के भाजपा और AAP के बीच दो-ध्रुवीय विभाजन के चलते संभव हुई है. जहां कांग्रेस ९.७ प्रतिशत पर सिमट गई, वहीँ भाजपा ने ३२.२ प्रतिशत और AAP ने ५४.३ प्रतिशत मत समेटे. मतों के आयतन से मापें तो कोई चमत्कार नज़र नहीं आता, किन्तु इस विशिष्ट ध्रुवीकरण ने सीटों के मामले में AAP को कहीं बड़ा लाभ दे दिया. यह बीजगणित, अपने आप में बुर्जुआ जनवाद की परोक्ष प्रतिनिधित्व पर आधारित संसदीयता में अन्तर्निहित धोखाधड़ी को भी रेखांकित करता है, जो सर्वहारा पार्टियों के लिए बहुमत लेकर सत्ता में आना असंभव बना देता है.