- राजेश त्यागी/ 18.9.2026
हम ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण युग में जी रहे हैं, जहां मशीन का सर्जक मनुष्य, खुद पर, अपनी क्षमताओं और बुद्धिमत्ता पर विश्वास खोकर, इस आशंका और डर में जी रहा है कि मशीनों की कृत्रिम बुद्धिमत्ता जल्द ही उसकी अपनी
बुद्धिमत्ता को पार कर जाएगी, उसे मात दे देगी!
मनुष्य, खुद
अपनी ही रचना की क्षमताओं से भयभीत है!
उसे
डर है कि वह जल्दी ही अपनी रचना पर नियंत्रण खो देगा और उसकी सृजित मशीनें, उल्टा
उसी पर नियंत्रण हासिल कर लेंगी।
विज्ञान और तकनीक में हुई हालिया प्रगति, खासतौर से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के विकास से घबराए, बुर्जुआ बुद्धिजीवी और थिंक-टैंक, भविष्य की भयावहताओं के काल्पनिक चित्र बना रहे हैं।






