- राजेश त्यागी/ २०.३.२०१६
हिंदी
अनुवाद: कल्पेश डोबरिया
काश्मीर,
दक्षिण एशिया की देह पर, लगातार रिसते घाव के रूप में मौजूद है. पिछले कुछ समय से
यह प्रश्न बार-बार उभरता रहा है, और हाल ही में
जे.एन.यू. में काश्मीर की आज़ादी के पक्ष में नारे लगाए जाने की घटना के दौरान फिर
से उभरा है.
भारत
और पाकिस्तान, दो प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रों के बीच वैमनस्य का मुद्दा बना काश्मीर
का मसला, दरअसल १९४७ में भारतीय उपमहाद्वीप के प्रतिक्रियावादी, सांप्रदायिक विभाजन
का, उस महाविनाश का, सीधा परिणाम है जो ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा संगठित और
भारतीय बुर्जुआजी के कांग्रेस, मुस्लिम लीग और आरएसएस नीत घटकों तथा स्तालिनवादी
सीपीआई की वाहियात नीतियों द्वारा समर्थित प्रतिक्रांति के शिखर पर प्रकट हुआ. उपनिवेशवाद
विरोधी आन्दोलन के क्रूर दमन और बड़े पैमाने के सांप्रदायिक दंगों का संगठन करके देशी-विदेशी
पूंजीपति मिलकर मजदूर वर्ग द्वारा सत्ताहरण को रोकने में सफल रहे. दोनों के बीच
प्रतिक्रियावादी समझौते ने, उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का गर्भपात कर दिया, साम्राज्यवाद
के दो प्रतिद्वंद्वी ग्राहक राज्यों, भारत और पाकिस्तान, की स्थापना के लिए, भारतीय
महाद्वीप को दो हिस्सों में चीर डाला और जिसका परिणाम मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी
त्रासदी, सांप्रदायिक दंगों के तांडव के रूप में सामने आया जिसने व्यापक लूट,
आगज़नी और बलात्कारों के अतिरिक्त दो करोड़ जानें लीं.
भारत
और पाकिस्तान के शत्रु राज्यों के मध्यस्थ क्षेत्र के रूप में फंसा काश्मीर, १९४७
से इस शत्रुता का सबसे भयंकर शिकार हुआ है. काश्मीर के इलाके पर परस्पर विरोधी दावे
करते, दोनों देशों के पूंजीपतियों ने, अपनी-अपनी सुरक्षा में, इस क्षेत्र में भारी
सशस्त्र बलों की तैनाती करते हुए, परोक्ष युद्धों के जरिए, एक-दूसरे के इलाकों में
अशांति उत्पन्न करना जारी रखा है.