- राजेश त्यागी/ ५.४.२०१६
अनुवाद: सौरव भट्टाचार्य
अंबेडकरवादी दावा करता है: 'मार्क्सवादियों के पास जाति प्रश्न
का कोई समाधान नही है'।हताश, निराश स्टालिनवादी समर्पण करते हुए प्रत्य्त्तर देता है: 'तब मार्क्स और अंबेडकर को
साथ आना चाहिए'।
स्टालिनवादी और अंबेडकरवादी दोनों ही मुद्दे से भटक जाते हैं और जाति प्रश्न को समझने तक में असमर्थ रहते हैं, समाधान तो दूर की बात है।
भारत में जाति प्रश्न का उदय भारत के
सामाजिक विकास की जटिलताओं से होता है। सामाजिक श्रम को चार वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्र- में विभाजन के जरिए सामाजिक व्यवस्था का निर्माण हुआ। चार वर्णों की
इस जटिल और अवरुद्ध व्यवस्था के भीतर ही जातियों की ऊँच-नीच का क्रम अतीत में धीरे-धीरे
विकसित होता गया। इस व्यवस्था के कारण सामाजिक श्रम का सारा बोझ शूद्रों के ऊपर आ
गया जो सामाजिक सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर थे। वर्ण अनिवार्य रूप से जन्म के
आधार पर निर्धारित होता था और जिसे बदल पाने की कोई गुंजाइश नहीं थी।