हम ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण समय में जी रहे हैं, जहां मशीन का निर्माता मनुष्य, खुद पर, अपनी क्षमता पर और अपनी बुद्धिमत्ता पर विश्वास खोकर, इस शंका और डर में जी रहा है कि मशीनों की बुद्धिमत्ता जल्द ही उसकी अपनी बुद्धिमत्ता को पार कर जाएगी!
मनुष्य, खुद अपनी ही रचना की क्षमताओं से, उस पर नियंत्रण खोने को लेकर अपनी संभावित विफलता और मशीन को अपनी इच्छा
के अधीन रखने में अपनी अक्षमता से डरा हुआ है।
बुर्जुआ बुद्धिजीवी और थिंक-टैंक, विज्ञान और तकनीक में हुई प्रगति से, भविष्य में आने वाली भयावहताओं की
कल्पना कर रहे हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में हाल की प्रगति के इस डर के बीच, सभी देशों के शासक वर्ग में एक आम सहमति उभर रही है कि इस प्रगति को यदि पूरी तरह न भी रोका जा सके तो उसे कम से कम धीमा जरूर कर दिया जाए।
