Friday, 18 September 2026

क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का डर वास्तविक है?

- राजेश त्यागी/ 18.9.2026 

हम ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण युग में जी रहे हैं, जहां मशीन का सर्जक मनुष्य, खुद पर, अपनी क्षमताओं  और बुद्धिमत्ता पर विश्वास खोकर, इस आशंका और डर में जी रहा है कि मशीनों की कृत्रिम बुद्धिमत्ता जल्द ही उसकी अपनी बुद्धिमत्ता को पार कर जाएगी, उसे मात दे देगी!

मनुष्य, खुद अपनी ही रचना की क्षमताओं से भयभीत है!

उसे डर है कि वह जल्दी ही अपनी रचना पर नियंत्रण खो देगा और उसकी सृजित मशीनें, उल्टा उसी पर नियंत्रण हासिल कर लेंगी।

विज्ञान और तकनीक में हुई हालिया प्रगति, खासतौर से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के विकास से घबराए, बुर्जुआ बुद्धिजीवी और थिंक-टैंक, भविष्य की भयावहताओं के काल्पनिक चित्र बना रहे हैं।

इस डर के बीच, सभी देशों के शासक वर्ग में एक आम सहमति उभर रही है कि इस प्रगति को यदि पूरी तरह न भी रोका जा सके तो उसे कम से कम धीमा जरूर कर दिया जाए।

पिछली सदी में सम्पन्न, महान अक्टूबर क्रांति में, लेनिन के साथ इस क्रांति के सह-नेता लियोन ट्रॉट्स्की ने, 1937 में चौथे अंतर्राष्ट्रीय के कार्यक्रम में एक कड़ी,  भविष्यसूचक चेतावनी दी थी कि समकालीन मानव चेतना, सामान्य रूप से, समय की जरूरत से बहुत पीछे घिसट रही है, जिसके परिणाम घातक होंगे। मानव चेतना के इस वक़्त से पीछे छूटने  को, उन्होंने, अपने समय में, मौजूद और आसन्न संकट के मूल स्रोत के रूप में चिह्नित किया था।

ट्रॉट्स्की ने जिस 'मानव चेतना' की बात की थी, तब से एक सदी बाद, वह दुर्भाग्य से अपने समय से और भी अधिक पीछे छूटती चली गई है।

माइक्रोचिप, रोबोट और ड्रोन के आविष्कार के बाद से, पिछली सदी ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अभूतपूर्व प्रगति देखी है। इस अभूतपूर्व प्रगति के चलते, पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य की पुरातन संरचनाएं, जो कल तक इस प्रगति का इनक्यूबेटर थीं, आज इन्हें समाहित करने में, बेहद अपर्याप्त साबित हो रही हैं। इसका परिणाम, इन संरचनाओं के खिलाफ़ नई शक्तियों का विद्रोह, राष्ट्रीय सीमाओं के बाहर युद्धों, हिंसा और रक्तपात के माध्यम से विस्तार पाने की हताश कोशिश के रूप में सामने आ रहा है।

विडंबना यह है कि पूंजीवादी राष्ट्र-राज्यों द्वारा लादी गई सभी बाधाओं के बावजूद, जिन्होंने एक सदी से भी अधिक सामाजिक विकास की गति को बहुत धीमा किए रखा है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शक्तियां, नई ऊंचाइयों पर पहुंच गई हैं।

एक तरफ़ कुलांचे मारते विज्ञान और तकनीक और दूसरी तरफ़ उसके साथ मौजूद निरंतर पिछड़ती जा रही मानव चेतना के बीच बढ़ते जा रहे तनाव ने, ऐतिहासिक महत्व के संकट को जन्म दिया है। इस संकट का सबसे स्पष्ट प्रक्षेपण, ‘आर्टिफ़िशियल इन्टेलिजेन्स’ के क्षेत्र में हुई प्रगति को लेकर शासक वर्ग के डर में सामने आ रहा है। हमारा युग- विज्ञान और तकनीक का युग- इसी संघर्ष और उससे पैदा हुए संकट से लबरेज़ है।

अपनी महत्वपूर्ण कृति 'Das Finanzkapital' में जर्मन अर्थशास्त्री और विद्वान रुडोल्फ हिल्फर्डिंग ने तथ्यपूर्ण आंकड़े पेश किए थे कि उनके समय की उत्पादक शक्तियां, और वह भी आज से एक सदी पहले ही, उस स्तर को छू चुकी थीं जहां किसी को कोई शारीरिक श्रम करने की जरूरत नहीं रह गई थी और मशीनें उत्पादन करके वस्तुओं को आपके दरवाजे तक पहुंचा सकती थीं।

तब से, मनुष्य का आर्थिक जीवन, उत्पादन प्रक्रियाओं के निरंतर समाजीकरण और विस्तार के चलते, वैश्विक स्तर पर अधिकाधिक एकीकृत होता गया है।

मशीनें, लगातार मानव श्रम की जगह ले रही हैं- यह प्रक्रिया, समूची  आर्थिक प्रगति के केंद्र में है। आर्टिफ़िशियल इन्टेलिजेन्स के क्षेत्र में हाल की खोजें और विकास, इस प्रगति में एक निर्णायक मोड़ रहे हैं।

मानवता का दुर्भाग्य यह है कि हमारे समय की यह सारी वैज्ञानिक प्रगति, पुराने पूंजीवादी समाज के जर्जर इन्क्यूबेटर के अंदर घुटी हुई है। इस इन्क्यूबेटर को तोड़ने में विफलता की कीमत, उत्पीड़ित मानवता, भ्रष्टाचार, गरीबी, युद्धों, हिंसा और रक्तपात के चक्रव्यूह में पिसते हुए चुका रही है। सामान्य रूप से मानव जीवन का लगातार ह्रास  हो रहा है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हासिल तमाम उपलब्धियां, पूंजीवाद के तहत अनचाहे परिणाम दे रही हैं। हर नई छलांग, श्रमजीवी जनता के लिए और अधिक निराशा, शोषण और दमन ला रही है।

हम पाते हैं कि विज्ञान और तकनीक में हर नई खोज, हर नई प्रगति, मानव श्रम को आसान बनाने के बजाय, लोगों को रोजगार से बाहर धकेल रही है। विज्ञान के सारे अनुप्रयोग मानव कल्याण के बजाय मुनाफाखोरी, युद्ध, हिंसा और रक्तपात पर केंद्रित हैं।

इसी क्रम में, आर्टिफ़िशियल इन्टेलिजेन्स जैसे वास्तविक वरदान को भी पूंजीवाद की गली-सड़ी व्यवस्था ने, श्रमजीवियों के लिए एक क्रूर अभिशाप में बदल दिया है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में हालिया खोजों ने, पूंजीवाद के तहत एक वास्तविक भय को जन्म दिया है- श्रमजीवियों की भीड़ का ऐसी अवशिष्ट आबादी में बदल जाना जो पूंजीपतियों और पूंजीवाद दोनों के लिए किसी काम की नहीं रह जाएगी। अगर रोबोट और ड्रोन काम कर सकते हैं, तो इंसानों की क्या जरूरत है? तो, उनका क्या होगा? जाहिर है, उन्हें अगर फिलिस्तीन की तरह सीधी योजनाबद्ध तबाही में नष्ट न भी किया गया तो निश्चित ही वे भूख, बेकारी और गरीबी का शिकार बनने के लिए छोड़ दिए जाएंगे।

लेकिन इससे बड़े उपद्रव, अशांति और प्रतिरोध जन्म लेंगे जिन्हें एक सचेत पूंजीवाद विरोधी क्रांति में संघनित होते देर नहीं लगेगी- शासक वर्ग इससे डरता है!

चूंकि एक सदी से सामाजिक चेतना, समग्र रूप से, इतिहास की मांग के अनुरूप खड़े होने में विफल रही है, इसलिए निजी-संपत्ति संबंधों पर टिका पूंजीवाद और उसका रक्षक, पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य, अभी भी जीवित हैं। वे वैश्विक रूप से एकीकृत हो रही उत्पादन शक्तियों को राष्ट्रीय-रूप से अवरुद्ध कर रहे हैं और उन्हें अपने तुच्छ पिंजरों में कैद रखे हुए हैं। ह्यूमन इन्टेलिजेन्स भी इनमें कुंद हो रही है।

यह युग-पिछड़ी मानव चेतना ही, इस डर का आधार है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मनुष्य की बौद्धिक क्षमताओं पर हावी हो जाएगी, उससे आगे निकाल जाएगी।

कहने की जरूरत नहीं कि अगर मानव चेतना और बुद्धिमत्ता, वास्तव में मशीनों की बुद्धिमत्ता (आर्टिफ़िशियल इन्टेलिजेन्स) से आगे बढ़ने में विफल रहती है, तो परिणाम अवांछनीय और गंभीर होंगे।

मानवता के सामने मुख्य चुनौती यही है कि वह अपनी चेतना और बुद्धिमत्ता के स्तर को, आर्टिफ़िशियल इन्टेलिजेन्स के युग की विशिष्ट आवश्यकताओं और अनिवार्यताओं के साथ तालमेल रखने के लिए, ऊपर से ऊपर उठाए।

साइंस और टेक्नॉलॉजी के इस युग में, आज समग्र रूप से मानवता एक बड़े संकट के दोराहे पर खड़ी है- या तो उसे अपनी चेतना (Consciousness) और बुद्धिमत्ता (Intelligence) को ऊंचे से ऊंचे उठाना होगा या फिर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सहित विज्ञान और तकनीक की तमाम प्रगति को, रोकना या धीमा करना होगा.

विज्ञान और तकनीक पर अंकुश लगा रहे पूंजीवादी प्रबंध को या तो उसे उखाड़ फेंकना होगा, मानवता के कल्याण के लिए तमाम शारीरिक श्रम को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा निर्देशित मशीनों से प्रतिस्थापित कर देना होगा- या फिर लूट, युद्धों और हिंसा के रूप में, अपनी इस विफलता के लिए, अकल्पनीय रूप से क्रूर दंड को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

पहला विकल्प इस संकट के प्रति मजदूर वर्ग की प्रगतिशील प्रतिक्रिया है, जबकि दूसरा शासक वर्ग द्वारा इसका प्रतिगामी उत्तर है!

जबकि शासक वर्ग विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रगति से डर रहा है, उसके इस डर को सांझा करने से इनकार करते हुए, मजदूर वर्ग, विज्ञान और उस पर टिके भविष्य को आशा और विश्वास से देख रहा है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में प्रगति की गति को धीमा करने या रोकने की तमाम हताश अपीलों और मांगों का विरोध करते हुए, मजदूर वर्ग, समाजवादी क्रांति के माध्यम से पूंजीवाद के विनाश को, फ़ौरी एजेंडे पर रखता है।

तकनीकी प्रगति पर ब्रेक लगाने के बजाय, मजदूर वर्ग, उसके विकास को सुनिश्चित बनाने और उसके अनुरूप काम के घंटों में कटौती की मांग करता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में, उसके लिए यह बिल्कुल जायज़ होगा कि वह शारीरिक श्रम के पूर्ण उन्मूलन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा निर्देशित मशीनों से इसके प्रतिस्थापन की मांग प्रस्तुत करे।

अंत में, जबकि शासक पूंजीपति वर्ग तमाम वैज्ञानिक प्रगति की कीमत पर पूंजीवाद की रक्षा करने में रुचि रखता है, श्रमजीवी जनता का हित विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अबाध प्रगति और पूंजीवाद के विनाश में है!    

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