राजेश त्यागी/ 3.10.2026
अफवाहें हैं कि विपक्षी नेताओं और पार्टियों के अलावा, सत्तारूढ़ भाजपा का एक धड़ा जो RSS के करीब है और हाशिए पर धकेले जाने से नाराज़ होकर मोदी का विरोधी हो गया है, इस आंदोलन को सहायता और हवा दे रहा है, जबकि अंबानी और दूसरे कॉर्पोरेट इसकी फंडिंग कर रहे हैं. नितिन गडकरी, मोहन भागवत, स्मृति ईरानी और कई अन्य लोगों के नेतृत्व में यह धड़ा, मोदी-शाह गठजोड़ को सत्ता से हटाने या कम से कम उनके प्रभाव को कम करने के लिए दबाव बना रहा है.
आश्चर्य नहीं कि इस चालबाज़ी को ‘लोकतंत्र की लड़ाई’ के फर्जीवाड़े के पीछे छिपाया जा रहा है, ताकि आम जनता को धोखा देकर अपने संकीर्ण-स्वार्थी लक्ष्य को हासिल करने के लिए उसे इस्तेमाल किया जा सके. मगर वे बस मोदी सरकार पर समझौते के लिए दबाव बनाना चाहते हैं.
मगर यह उठापटक, उस मेहनतकश
जनता की सच्ची और जायज़ आकांक्षाओं को भी अनायास ही हवा दे रही है, जिसने पिछले एक
दशक से ज्यादा मोदी के नेतृत्व में चल रहे बर्बर पूंजीवादी शासन की असली मार झेली
है. कॉर्पोरेट शार्कों के बीच यह टकराव, शासक वर्ग के हिस्सों को तो इस संघर्ष में
घसीट ही रहा है, साथ ही मेहनतकश जनता की आंखें भी खोल रहा है.
पिछले एक दशक से अधिक
के अपने शासन में, मोदी सरकार बड़े भारतीय और विदेशी कॉर्पोरेट के एक औजार के रूप में बेनकाब हो
चुकी है. मेहनतकश जनता बड़े पैमाने पर उसके शासन के खिलाफ हो चुकी है और उसका पतन
देखना चाहती है.
विपक्ष के नेता और पार्टियां, इस जन-भावना में, सत्ता में वापसी का अवसर देख रहे हैं- सत्ता पर बड़े पूंजीपतियों की गिरफ़्त को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी पायलट सीट पर मोदी की जगह खुद बैठने के लिए. मोदी की तरह ही, ये विपक्षी नेता और उनके नेतृत्व वाली पार्टियां भी बड़े कॉर्पोरेट के प्रतिद्वंद्वी गिरोहों से बंधी हैं, जो अडानी और मोदी को आर्थिक और राजनीतिक पिरामिड के शिखर से हटाकर उसकी जगह खुद वहां पहुंचना चाहते हैं. लोकतंत्र की रक्षा के नारों के पीछे, इन्हीं कॉर्पोरेट शार्कों के नंगे और बर्बर स्वार्थ छिपे हैं, जो अर्थसत्ता और राजसत्ता, दोनों पर अपने लिए एकाधिकार सुनिश्चित करना चाहते हैं. न तो कॉर्पोरेट दुनिया में और न ही विपक्ष में इस कॉर्पोरेट दुनिया के राजनीतिक एजेंट, किसी लोकतंत्र, स्वतंत्रता या आज़ादी के लिए खड़े हैं।
मोदी की तरह ही, राहुल गांधी, केजरीवाल, अखिलेश, ममता, तेजस्वी भी बड़े कॉर्पोरेट के सिद्ध-दलाल और पूंजीवादी शासन के बेशर्म समर्थक
हैं. अतीत में उनके हाथों में राजनीतिक सत्ता आज मोदी के शासन से किसी मायने में
भिन्न नहीं थी. सत्ता से बाहर हो जाने पर बस वे लोकतंत्र और आजादी की दुहाई दे रहे
हैं और लफ्फाज़ी से जनता को बेवकूफ़ बना रहे हैं.
मगर मोदी-शाह की जोड़ी
की जगह राहुल-तेजस्वी-अखिलेश-ममता-माया की जोड़ी के सत्ता ले लेने से या अडानी समूह
की जगह अंबानी समूह का वर्चस्व कायम हो जाने से, मेहनतकश जनता को कुछ भी हासिल
नहीं होगा. धर्मेंद्र प्रधान जैसे मंत्रियों या ज्ञानेश कुमार जैसे नौकरशाहों के इस्तीफ़े
भी, मेहनतकश जनता के किस काम के हैं?
मज़दूर वर्ग को निश्चित
रूप से मोदी सरकार को खदेड़ बाहर करने के लिए जी-जान से जुटना चाहिए, मगर इस कवायद
का मकसद विपक्ष के बुर्जुआ नेताओं को सत्ता दिलाना नहीं, बल्कि खुद सत्ता पर
दावेदारी होना चाहिए. मोदी सरकार को खदेड़ते हुए, उन्हें संगठित होकर अपनी सत्ता के
लिए लड़ना चाहिए. उन्हें मजदूरों और मेहनतकशों की सरकार कायम करने के लिए लड़ना चाहिए.
झूठे वामपंथी नेता,
सीधे तौर पर, बुर्जुआ दक्षिणपंथी विपक्ष को यह भ्रम फ़ैलाने में मदद दे रहे हैं कि
संघर्ष का लक्ष्य ‘लोकतंत्र’ की हिफाज़त करना है. लफ्फाज़ी वे कुछ भी करें, मगर उनका फ़ौरी
उद्देश्य किसी भी तरह राहुल-तेजस्वी-अखिलेश-ममता बोगी को सत्ता दिलाकर अपने चेक कैश
करना है.
ये ठग, बड़े कॉर्पोरेट
के पे-रोल पर हैं. 2014 में, स्तालिनवादियों कि सबसे बड़ी पार्टी सी.पी.आई.एम, भारत में कॉर्पोरेट चंदा पाने
वाली चौथी सबसे बड़ी पार्टी थी.
21वीं सदी में, बुर्जुआ लोकतंत्र या इसकी संस्थाओं- संसद, चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट- की रक्षा के लिए लगाई जा रही गुहारें फर्जीवाड़ा हैं और मेहनतकश जनता के साथ सरासर धोखा हैं. न तो यह लोकतंत्र या इसकी संस्थाएं और न ही वोट देने का अधिकार, मेहनतकश जनता के किसी काम का रहा है.
19वीं सदी के अंत तक, ज़ारशाही रूस, मंचू चीन या ब्रिटिश भारत के लिए बुर्जुआ लोकतंत्र के लिए संघर्ष कुछ प्रासंगिकता
रखता था. इसका कारण था कि मज़दूर वर्ग, स्वतंत्र रूप से और बुर्जुआ वर्ग के खिलाफ सत्ता
के लिए संघर्ष में दावेदारी करने के लिए पर्याप्त रूप से संगठित नहीं था। संविधान
सभा बुलाने का नारा, अभी भी मध्यकालीन
सामंतों या औपनिवेशिक शासन के खिलाफ़ आकर्षक आह्वान था.
20वीं सदी के आगमन के साथ, विश्व अर्थव्यवस्था के
केंद्र में वित्तीय पूंजी के दबदबे, राष्ट्रीय बुर्जुआ
वर्ग और साथ ही मजदूर वर्ग के सुदृढ़ीकरण ने, पुराने युग का अंत कर दिया. दुनिया
की पिछड़ी परिधि में स्वतंत्र रूप से संगठित और राजनीतिक रूप से लामबंद मजदूर वर्ग
के लिए, बुर्जुआ लोकतंत्र के
लिए संघर्ष ने अपनी सारी चमक खो दी.
जहां पश्चिम में, अब कम्युनिस्ट पार्टियों के सामने निर्विवाद कार्यभार था- समाजवाद के लिए सीधे
संघर्ष में, बुर्जुआ लोकतंत्रों की तख्ता-उलटाई, वहीं पूर्व में, देशी ज़मींदारों और ब्रिटिश
साम्राज्यवादियों के गठजोड़ के खिलाफ, क्रांति की सफलता की अनिवार्य शर्त थी- उस
पर मजदूर वर्ग का राजनीतिक वर्चस्व, जिसे क्रांति की जीत के साथ
उसकी राज्य तानाशाही में विकसित होना था.
इसके विपरीत, उस पर राष्ट्रीय
बुर्जुआ वर्ग के प्रभुत्व की संभावना का अर्थ था- प्रतिक्रांति की जीत और
परिणामस्वरूप क्रांति और मेहनतकश जनता का खूनी दमन. इसलिए, बुर्जुआ लोकतन्त्रों के
गठन और उनकी हिफाज़त के लिए संघर्ष ने, हर जगह, मजदूर वर्ग के लिए महत्त्व खो दिया.
इस प्रकार, सुदूर पूर्व- रूस, चीन और भारत- में बुर्जुआ लोकतन्त्रों की विजय, क्रांति के खूनी दमन के जरिये हासिल
हुई. रूस में प्रिंस ल्वोव और केरेन्स्की, चीन में सुन-यात-सेन और बाद में च्यांग काई-शेक की कुओमिन्तांग, भारत में गांधी-नेहरू-पटेल-अंबेडकर के नेतृत्व में कांग्रेस और पाकिस्तान में
जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग का सत्तारोहण, एक खूनी प्रतिक्रांति के जरिये ही हासिल किया गया था, जिसने ऐसे विफल राज्यों को पैदा किया, जो अपने मजदूर वर्ग के किसी भी स्वतंत्र आंदोलन के प्रति स्वाभाविक रूप से
शत्रुतापूर्ण थे.
20वीं सदी में, लोकतंत्र का प्रश्न इस
प्रकार समाजवाद के प्रश्न का अभिन्न और अकाट्य हिस्सा बन गया.
ये रूस में मेन्शेविक और चीन, भारत और पाकिस्तान में स्टालिनवादी-माओवादी थे, जो राजनीतिक रूप से झूठे और ऐतिहासिक रूप से खारिज हो चुके ‘दो-चरण की क्रांति’ के सिद्धांत की लीक पीटते हुए, लोकतंत्र के प्रश्न को समाजवाद के लिए संघर्ष से अलगाव और अमूर्त रूप में देखते रहे. पूंजीपति वर्ग के घृणित शासन के कूड़े के ढेर में ‘लोकतंत्र’ बीनते हुए, वे इस शासन के दयनीय ढिंढोरची बन गए.
21वीं सदी में, यानी अक्टूबर क्रांति
में मजदूर वर्ग और समाजवाद की शानदार जीत के सौ साल बाद, बुर्जुआ लोकतंत्र या उसकी संस्थाओं की हिफाज़त की तमाम बातें, न सिर्फ़ कालातीत हो
चुकी हैं, पुरानी पड़ चुकी हैं, बल्कि मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण
से, वे पूरी तरह प्रतिक्रियावादी हैं।
मजदूर वर्ग का बुर्जुआ
लोकतंत्र की रक्षा में कोई हित या रूचि नहीं है. वह पहले से ही अच्छी तरह जानता है कि
लोकतंत्र और पूंजीवाद एक साथ नहीं रह सकते. पूंजीवादी लोकतंत्र, बड़े पूंजीपतियों की छद्म तानाशाही है, जो मुट्ठी भर बड़े
पूंजीपतियों को मेहनतकश जनता को लूटने और उसका शोषण करने के लिए स्वतंत्रता और
आजादी सुनिश्चित करती है और देर-सवेर अपने विलोम- फ़ासीवाद
या किसी अन्य प्रकार की पूंजीपति वर्ग की खुली तानाशाही- में बदलने के लिए शापित
है. राजनीतिक ठग ही, बड़े पूंजीपतियों के इस शासन को, ‘लोकतंत्र’ कह सकते हैं.
मजदूर वर्ग के लिए आज
लोकतंत्र का अर्थ, बुर्जुआ नेताओं और पार्टियों के साथ मिलकर नहीं, बल्कि सीधे उन्हीं
के विरुद्ध संघर्ष है. पूंजीवादी लोकतंत्र की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि उसकी तख्ता-उलटाई के लिए संघर्ष. बुर्जुआ विपक्ष के नेताओं को सत्ता
दिलाने के लिए नहीं, बल्कि वर्किंग क्लास के नेतृत्व में मेहनतकश जनता की सरकार के
लिए, समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना के लिए, क्रांतिकारी संघर्ष!

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