Thursday, 22 March 2018

वाम आन्दोलन की एकता और राजनीतिक संघर्ष का प्रश्न

- वर्कर्स सोशलिस्ट पार्टी / २३.३.२०१८

स्तालिनवादियों और दूसरे तमाम छद्म-वामियों ने, जिनके विरुद्ध WSP ने समझौताहीन राजनीतिक संघर्ष छेड़ा है, बारम्बार हम पर यह कहते हुए आरोप लगाए हैं कि हमारे द्वारा छेड़े गए इस संघर्ष के चलते वाम एकता कमज़ोर हो रही है. इस प्रश्न पर विचार करना इसलिए बहुत ज़रूरी है चूंकि यह प्रश्न समूचे आन्दोलन को प्रभावित करता है. जिस कार्रवाई से वाम एकता कमज़ोर हो रही है, वह कार्रवाई किसी भी तरह क्रान्तिकारी नहीं हो सकती बल्कि प्रतिक्रांतिकारी ही होगी.

छद्म-वाम, जिसमें मुख्यतः स्तालिनवादी शामिल हैं, के विरुद्ध, हमारे राजनीतिक संघर्ष का समूचे वाम आन्दोलन और क्रान्तिकारी संघर्ष के साथ क्या सम्बन्ध है और वह उसे किस तरह प्रभावित करता है, इस प्रश्न पर तुरंत संजीदगी से विचार किया जाना चाहिए.

इस प्रश्न को समझने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि वाम आन्दोलन है क्या. वाम आन्दोलन का अर्थ लाल-नीले झंडे उठाए नेताओं, पार्टियों का संघात नहीं है. वाम-आन्दोलन सीपीआई, सीपीएम के क्रांतिविरोधी गठजोड़ ‘वाममोर्चे’ का पर्याय नहीं है. न ही वाम आन्दोलन लाल-नीले को एक करते, ‘जय भीम-लाल सलाम वालों’ की कीच-क्रीड़ा का मंच है. न ही यह वाम बुर्जुआजी के साथ लय-ताल मिलाते येचुरी-करात-राजा की मण्डली का कीर्तन है.

फिर वाम आन्दोलन क्या है? वाम आन्दोलन अलग-अलग विचारधाराओं, कार्यक्रमों से जुड़े सर्वहाराओं के उस आन्दोलन का नाम है जिसकी धार पूंजीपतियों-ज़मींदारों की इस सत्ता के विरुद्ध लक्षित है. इस अर्थ में, वाम आन्दोलन, सर्वहारा के सांझे हितों और सांझे ऐतिहासिक लक्ष्य के लिए, सांझा आन्दोलन है जिसे शहर-देहात की अर्ध-सर्वहारा मेहनतकश जनता का समर्थन हासिल है.

वाम आन्दोलन को, इस दूसरे अर्थ में समझ पाने में अक्षम, हमारे विरोधी, उसे पहले अर्थ में समझते हैं और इस तरह उसे बुर्जुआ वाम की गटर-गंगा में बदल देते हैं.

अब आइये देखें कि वाम आन्दोलन को कौन संगठित कर रहा है और कौन बिखेर रहा है, हम या हमारे विरोधी?

सबसे पहले तो वाम आन्दोलन, यानि सर्वहारा आन्दोलन को, पूंजीवाद की उत्पादन पद्धति, प्रेरित और संगठित करती है. यह उत्पादन पद्धति न सिर्फ मजदूर वर्ग को बड़े कारखानों, बल्कि समूचे औद्योगिक शहरों, क्षेत्रों में एक सेना के रूप में संघनित, संगठित करती है. पूंजीवाद, मज़दूरों को एक वर्ग के रूप में संगठित होने के लिए बाध्य कर देता है.

मगर छद्म-वामी इस संगठित हो रहे मजदूर-वर्ग की एकता को बिखेर देते हैं. वे अलग-अलग झंडों, बैनरों वाली ट्रेड यूनियनों की दुकानें खोलते हैं और मजदूर वर्ग को सैंकड़ों हिस्सों में बिखेर देते हैं. वे खुद इन यूनियनों के कन्धों पर ब्यूरोक्रेसी बनकर लद जाते हैं और मज़दूरों के सांझे हितों के लिए न लड़कर अपने तुच्छ प्रभाव के लिए आपस में ही लड़ना शुरू कर देते हैं. इस गुटबाज़ी में ये एक-दूसरे के खिलाफ, मालिकों और सत्ता से आमतौर से गठजोड़ करते हैं. ये झूठे नेता, मज़दूरों और मालिकों के बीच पुल बनकर, हर संघर्ष में समझौते के रास्ते तलाशते रहते हैं ताकि मज़दूरों पर अपना नियंत्रण कायम रख सकें. ये सभी मजदूर वर्ग के किसी भी ऐसे संघर्ष के विरोधी होते हैं जो मज़दूरों को उनके प्रभाव क्षेत्र से दूर ले जाता हो. ये नेता, समर्थन के लिए कुत्सित शर्तें रखते हैं जिनमें उनके नियंत्रण वाली यूनियन के एकाधिकार और बैनर टांगने से लेकर चंदा देने तक की सारी जोड़तोड़ शामिल होती हैं. मज़दूरों के इंकार करने पर या दूसरों से सहयोग लेने पर, ये नेता, हड़ताल तोड्कों की भूमिका अदा करते हैं. दुनिया भर में ये नेता इसी तरह मजदूर आन्दोलन को बिखेरे हुए हैं.

WSP इस बिखराव का विरोध करती है और वाम आन्दोलन को इन पेशेवर ट्रेड-यूनियन नेताओं के प्रभाव से बाहर निकालने के लिए संघर्ष का आह्वान करती है. हमारा यह राजनीतिक संघर्ष, वाम आन्दोलन को तोड़ने के लिए है या जोड़ने के लिए?

हम मजदूर वर्ग के सांझे संघर्ष के समर्थक हैं और झूठे वामियों की उन तमाम कार्रवाइयों का विरोध करते हैं जो मजदूर वर्ग के सांझे संघर्ष को तोड़ती-बिखेरती हैं. हम वाम आन्दोलन की एकता के, जो सर्वहारा की एकता के सिवा और कुछ नहीं है, प्रबल समर्थक हैं. हम खुद को बिना शर्त, इस एकता के पक्ष में घोषित करते हैं. हम मज़दूरों, मेहनतकशों से कहते हैं कि वर्ग-शत्रु के विरुद्ध संघर्ष में सारे मतभेद भूलकर एक हो जाओ.

हम उन सभी का विरोध करते हैं जो झंडे, बैनरों को लेकर मज़दूरों के बीच विग्रह कराते हैं और उनके सांझे संघर्षों को बिखेरते हैं.

हम न सिर्फ अलग-अलग मालिकों के खिलाफ और अलग-अलग कारखानों में, बल्कि पूंजीवादी सरकार और राज्य के खिलाफ संघर्ष में भी वाम एकता के प्रबल समर्थक हैं. इस एकता को हम क्रान्तिकारी संघर्ष की विजय की पक्की गारंटी समझते हैं. विशेष रूप से फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष में हम वाम आन्दोलन को एकजुट किए जाने की फौरी जरूरत पर बल देते हैं और इसे किसी भी स्थिति में भविष्य के लिए स्थगित न करने की अपील करते हैं.

मगर हमारे विरोधी, ये छद्म-वामी, इस वाम एकता से इनकार करते हुए, राहुल-लालू-माया-ममता जैसे धुर दक्षिणपंथी नेताओं और उनकी पार्टियों के साथ चुनावी जोड़तोड़ की जुगत में लगे रहते हैं. स्तालिनवादी, न तो मजदूर वर्ग में और इसलिए न ही उसकी एकता में कोई विश्वास रखते हैं. उनका सारा विश्वास बुर्जुआ दक्षिणपंथी नेताओं के साथ गठबंधन बनाने में है जिन्हें वे ‘धर्मनिरपेक्ष, जनवादी और वाम गठबंधन’ बताकर प्रचारित करते हैं.

इन नेताओं के सारे क्रियाकलाप, एक तरफ मजदूर वर्ग की एकता को खंडित करने और दूसरी तरफ बुर्जुआ दक्षिणपंथ के साथ चुनावी मोर्चे बनाने और वाम आन्दोलन को उसके पीछे बांधने में निहित है.

अपनी राजनीति, कार्यक्रम और व्यावहारिक कार्रवाइयों में, ये नेता और इसकी पार्टियां मेन्शेविक दक्षिणपंथी पार्टियां हैं. बुर्जुआजी की दलाल, इन पार्टियों और इसके नेताओं पर हमारा हमला, रही वाम आन्दोलन को तोड़ता नहीं, बल्कि जोड़ता है. यह हमला वाम आन्दोलन के बिखराव को लांघते हुए, तमाम सर्वहाराओं से पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में एकजुटता की अपील करता है.

WSP के हमलों के आगे लाचार और नंगे होते जा रहे ये मेन्शेविक नेता, एक होकर WSP के ख़िलाफ़ चिल्ल-पों करते हैं कि WSP आन्दोलन में फूट डाल रही है. यह सरासर झूठ है. WSP, पूंजीवाद-फासीवाद के विरुद्ध, संघर्ष में तमाम मज़दूरों, मेहनतकशों की एकता को सर्वोपरि महत्त्व देती है और सभी विचारों, झंडों, बैनरों से जुड़े मज़दूरों से एक होकर संघर्ष करने की अपील करती है.

लेकिन इस अपील का यह अर्थ कतई नहीं है कि वाम शिविर के भीतर बुर्जुआ दलालों और घातियों के खिलाफ संघर्ष को क्षण भर के लिए भी रोक दिया जाय. जैसा हमने ऊपर कहा कि तमाम संघर्षों में सभी विचारों, झंडों, बैनरों के समर्थक मजदूर कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ें. लेकिन इसका अर्थ, किसी भी स्थिति में, राजनीतिक मतभेदों और संघर्षों को तिलांजलि देना या स्थगित करना नहीं हो सकता.

मेंशेविकों की हमेशा ही यह शिकायत और मांग रही है कि बोल्शेविक उनके विरुद्ध संघर्ष करके वाम एकता को नुकसान पहुंचा रहे हैं और इसलिए इस संघर्ष को तुरंत रोका जाय. मगर इतिहास हमें ठीक इसके विपरीत सिखाता है. इतिहास हमें बताता है कि अर्थवाद से मेंशेविज्म तक, तमाम क्रांतिविरोधी प्रवृत्तियों के खिलाफ संघर्ष में ही बोल्शेविज्म, तपा-मंजा, पला-बढ़ा और विजयी हुआ. यदि बोल्शेविज्म इन रंग-बिरंगे क्रान्ति-विरोधियों के खिलाफ संघर्ष से जरा भी विरत हो जाता तो क्रान्ति असंभव थी.

लेनिनवाद जिस चीज़ को सर्वोपरि रखता है, वह वाम शिविर के भीतर यह सतत और समझौताविहीन संघर्ष ही है. लेनिन हमें बिना किसी रियायत या लाग-लपेट इस संघर्ष को चलाने और विजय हासिल करने के लिए ललकारता है. लेनिनवाद, विरोधी प्रवृत्तियों के साथ किसी भी समझौते या रियायत को स्पष्टतः अस्वीकार करता है और ऐसे तमाम प्रयासों को भी क्रांतिविरोधी कहकर ख़ारिज करता है.

वाम आन्दोलन के भीतर, क्रान्ति-विरोधी प्रवृत्तियों, कार्यक्रमों के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष उतना ही जरूरी है जितना उसके बाहर वर्ग-शत्रु के विरुद्ध यह जरूरी है. रंग-बिरंगे छद्म-वामी, वाम आन्दोलन के भीतर, वर्ग-शत्रु के ही एजेंट हैं. वाम शिविर के भीतर संघर्ष, उसके बाहर पूंजीवाद-फासीवाद का सिलसिला ही नहीं है बल्कि उन पर वाम शिविर की विजय की अनिवार्य और निर्णायक शर्त भी है.

रीढविहीन पूंजीवाद-फासीवाद, अपने सहारे खड़े होने में असमर्थ हैं. वे इन्ही छद्म-वामियों के, येचुरी-करात-राजा के, सहारे खड़े हैं. वाम शिविर में घुसे इन सियारों और इनके मेन्शेविक-स्तालिनवादी कार्यक्रम के विरुद्ध, फैसलाकुन संघर्ष के बगैर, इन्हें इस संघर्ष में परास्त किए बगैर, पूंजीवाद-फासीवाद के खिलाफ संघर्ष तो दूर, संघर्ष का प्रश्न भी ठीक से खड़ा नहीं किया जा सकता.

आन्दोलन में, वर्ग-संघर्ष में, एकता और राजनीतिक संघर्ष, क्रांतिकारियों के लिए कभी भी दो विरोधी ध्रुव नहीं रहे. वे एक दूसरे के पूरक हैं. बाहर, पूंजीवाद-फासीवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए, वाम शिविर को जिन साधनों से सशक्त बनाया जा सका है, उनमें इस शिविर के भीतर विरोधी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष, सर्वोपरि है. WSP का समूचा राजनीतिक संघर्ष इसी ओर निदेशित है.

हमारे इस संघर्ष से घबराए, स्तालिनवादी नेता, मक्कारी से, हमारे इस राजनीतिक संघर्ष को कोसते हुए, इसे वाम आन्दोलन के लिए घातक बता रहे हैं. सच यह है कि वे इस संघर्ष को रोककर, अपना पुराना खेल जारी रखना चाहते हैं. वे मजदूर आन्दोलन को बिखराव में रखकर, उसे वाम आन्दोलन के झूठे बैनर तले, बुर्जुआ पार्टियों और नेताओं के पीछे बांधना चाहते हैं.

वे रंगे सियार, स्वतंत्र मजदूर आन्दोलन के खिलाफ हैं और उसे अपने दमघोंटू नियंत्रण में बनाए रखना चाहते हैं ताकि वह पूंजीवाद के लिए कोई खतरा न बन सके. पूंजीवाद और पूंजीपतियों की छद्म तानाशाही को चुनौती देने के बजाय, उसके ये चौकीदार, उसे लोकतंत्र बताकर प्रचारित करते हैं, और अपने अनुयायियों को उसकी सुरक्षा में तैनात होने के लिए अपील करते रहते हैं. वे टाटा-बिरला, अडानी-अम्बानी की इस सात दशक पुरानी तानाशाही को फासीवाद से खतरा बताकर, युवाओं, मेहनतकशों को इसके बाएं खूंटे से बांधते हैं.

पूंजीवाद-फासीवाद के खिलाफ किसी भी संजीदा लड़ाई को, वाम शिविर में घुसे उनके ट्रोज़न हॉर्स असंभव बना रहे हैं. पिछले आठ-नौ दशकों में इन दलालों ने क्रान्तिकारी आन्दोलन की जड़ों तक को सुखा डाला है.

ये हमारे राजनीतिक प्रचार और संघर्ष से खौफ खाते हैं चूंकि ये अपने ही आपराधिक इतिहास पर नहीं जाना चाहते. उस पर पर्दा डालना चाहते हैं. वे वाम शिविर में बहस को किसी भी कीमत पर रोक देना चाहते हैं, उसका गला घोंटना चाहते हैं.

क्रांतिविरोधी नेताओं, पार्टियों के साथ कोई भी एकता, वाम आन्दोलन को नुकसान ही पहुंचाएगी. ऐसी एकता, आन्दोलन को बेदम करते हुए, उसे बुर्जुआ नेताओं, पार्टियों के मातहत करते हुए, बुर्जुआ सत्ता प्रतिष्ठान के पीछे बांधेगी. इन झूठे नेताओं और पार्टियों के विरुद्ध संघर्ष में, वाम शिविर के भीतर मज़दूरों, मेहनतकशों और युवाओं की लामबंदी, उनके बीच एकता ही, वाम शिविर को एकजुट और सुदृढ़ करेगी. वाम एकता का अर्थ, सर्व-संग्रहवाद नहीं है, बल्कि क्रान्तिकारी कार्यक्रम के गिर्द वाम शक्तियों-मज़दूरों, मेहनतकशों, युवाओं की गोलबंदी है.

WSP, इन झूठे नेताओं और इनकी बोगस पार्टियों द्वारा की जा रही, वाम एकता की तमाम फ़र्ज़ी अपीलों को ख़ारिज करते हुए, अग्रणी मज़दूरों और युवाओं का आह्वान करती है कि वे क्रान्तिकारी कार्यक्रम के लिए, वाम शिविर के भीतर, पूंजीवाद-फासीवाद के इन दलालों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष छेड़ें, उसमें विजय हासिल करें और वाम शिविर को एकजुट करते हुए पूंजीवाद-फासीवाद को ध्वस्त करें.

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