Wednesday, 14 January 2015

जनकार्य और जन-संगठन के प्रश्न पर

‘वर्कर सोशलिस्ट’ आन्दोलन द्वारा खोले गए राजनीतिक आक्रमण से, अपने क्रांति-विरोधी कार्यक्रमों की प्रतिरक्षा में असमर्थ स्तालिनवादी नेता, अपने कार्यकर्ताओं को यह कहकर बहला रहे हैं कि ‘वर्कर सोशलिस्ट’ ज़मीनी काम नहीं करते. इस प्रश्नोत्तरी के जरिये हमने ‘ज़मीनी काम’ की इस नानी की कहानी का अंत करते, इन झूठे नेताओं के इस दुष्प्रचार का स्पष्ट उत्तर दिया है.

प्रश्न: राजनीतिक आन्दोलन और संगठन के प्रश्न पर स्तालिनवादियों से आपके मतभेद का मूल बिंदु क्या है?
वर्कर सोशलिस्ट: वास्तव में इन दोनों ही प्रश्नों पर हमारा दृष्टिकोण, स्तालिनवादियों के ठीक उलट है. हम सर्वहारा के अग्रणी तत्त्वों के संगठन और उन्हें क्रान्तिकारी कार्यक्रम से लैस किये जाने को आन्दोलन और संगठन का मूल प्रस्थान बिंदु और अनिवार्य शर्त मानते हैं, और यह समझते हैं कि देर-सवेर सर्वहारा और मेहनतकश जनता के व्यापक किन्तु पिछड़े हिस्से इस सचेत राजनीतिक केन्द्रक की ओर आकर्षित होंगे. इसके ठीक विपरीत, स्तालिनवादी,  ‘जन-संगठन’, और ‘ज़मीनी काम’ के नाम पर, सबसे पहले ‘जनता’ के ‘पिछड़े हिस्सों’ की ओर उन्मुख होते हैं और अग्रणी तत्त्वों के राजनीतिक शिक्षण और संगठन की ओर पीठ फेरते हैं. वे राजनीतिक कार्यक्रम के लिए संघर्ष को औपचारिक और गौण मानते हुए, उसे सुदूर भविष्य के लिए स्थगित करते हैं.

प्रश्न: स्तालिनवादी आप पर ठीक यही आक्षेप लगाते हैं कि ‘वर्कर सोशलिस्ट’ ज़मीनी काम नहीं करते. आपका क्या कहना है?
वर्कर सोशलिस्ट: लेनिन की प्रसिद्ध रचना “क्या करें”, ‘ज़मीनी काम’ के इन पैरोकारों के विरुद्ध ही निर्दिष्ट है. लेनिन ने उन लोगों की कड़ी आलोचना की है जो सर्वहारा के अग्रणी तत्वों के बीच सचेत राजनीतिक संघर्ष को, जनकार्य और जन-संगठन से प्रतिस्थापित करना चाहते हैं. अपने इतिहास से खुद ही मुंह छिपाते और कार्यक्रम के प्रश्न पर बहस से बच निकलने के लिए रास्ता ढूंढते, स्तालिनवादी, हमारे विरुद्ध इस तरह के कुतर्क देते हैं. क्रान्तिकारी कार्यक्रम के निर्माण लिए जिस संघर्ष का आह्वान ‘वर्कर सोशलिस्ट’ कर रहे हैं, वह संघर्ष स्तालिनवादियों को ‘हवाई काम’ नज़र आता है. सर्वहारा और युवाओं के अग्रणी हिस्सों को कार्यक्रम से लैस करने में असमर्थ ये अवसरवादी, ‘जनता’ के राजनीतिक रूप से सबसे पिछड़े हिस्सों के बीच अपनी जगह तलाशते हैं और हमें भी वहीँ घसीट ले जाना चाहते हैं. क्रान्तिकारी सर्वहारा के अग्रदल को पूंजीवाद पर व्यापक हमले का नेतृत्व करने के लिए संगठित करने के बजाय, ये जनता के पीछे खुद को घसीट रहे हैं. यही इनके लिए ‘ज़मीनी काम’ है. पिछली एक सदी से भी अधिक से ये लोग यही कर रहे हैं. स्तालिनवादी, क्रान्तिकारी सर्वहारा के नेता नहीं, बल्कि जनता के सबसे पिछड़े हिस्सों की स्वयंस्फूर्त चेतना के उपासक हैं.

प्रश्न: तो आपके अनुसार क्रान्तिकारी पार्टी के करणीय और कार्यभार क्या हैं?
वर्कर सोशलिस्ट: समूचा क्रान्तिकारी राजनीतिक संघर्ष वास्तव में एक क्रान्तिकारी कार्यक्रम के निर्माण के लिए संघर्ष के सिवा और कुछ नहीं है. कार्यक्रम के लिए संघर्ष की इस प्रक्रिया में इतिहास के निष्कर्षों और वर्तमान के विश्लेषण का समाहार करते, आसन्न क्रांति के लिए रणनीतिक योजना तैयार करना और सर्वहारा, युवाओं की अग्रिम पंक्तियों को इस कार्यक्रम से लैस किया जाना, यह है क्रान्तिकारी पार्टी का कार्यभार.  

प्रश्न: मजदूरों और युवाओं के दैनंदिन संघर्षों में पार्टी की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
वर्कर सोशलिस्ट: वर्ग-संघर्ष, चाहे वह एक या अनेक कारखानों में हो या सड़क पर, वह पूंजी की व्यवस्था में संकट की अभिव्यक्ति, और वर्ग-हितों के असमाधेय टकराव की परिणति होता है. क्रान्तिकारी पार्टी को ऐसे प्रत्येक संघर्ष में हस्तक्षेप करना चाहिए. इस हस्तक्षेप का उद्देश्य उस संघर्ष पर अपना बैनर टांगना नहीं, बल्कि इसके अग्रणी तत्त्वों की चेतना को सचेत वर्ग-चेतना में बदलते हुए, सीमित संघर्ष को पूरे पूंजीपति वर्ग और उसकी सत्ता के विरुद्ध व्यापक हमले में बदलना होना चाहिए. अनुकूल परिस्थितियों में, छोटे से छोटा संघर्ष भी एक बड़े राजनीतिक संग्राम में परिणत हो सकता है.

प्रश्न: तो क्या जनता के पिछड़े हिस्सों के बीच काम आवश्यक नहीं?
वर्कर सोशलिस्ट: जनता के व्यापक पिछड़े संस्तर सिर्फ गहन राजनीतिक संकट के दौर में ही राजनीतिक प्रश्नों की ओर आकर्षित होते हैं और सिर्फ तभी इनके बीच राजनीतिक काम के लिए जमीन मौजूद होती है. संकट के समय भी ये पिछड़े संस्तर, पर्त-दर-पर्त ही उठते हैं और तब भी तमाम संस्तर नहीं उठ पाते. सबसे चेतन हिस्से सबसे पहले खिंचते हैं. संकट, जो कुछ समय के लिए ही टिकता है, के बाद स्थिरता और शांति के दौर आते हैं. इस शांतिकाल में सर्वहारा की वर्ग-चेतन, अग्रिम पंक्तियां ही राजनीतिक संघर्ष को जारी रखती हैं, जबकि पिछड़े हिस्से उदासीन रहते हैं. इस वक़्त क्रान्तिकारी पार्टियों का कार्यभार होता है- विगत की सफलताओ-असफलताओं से निष्कर्ष निकालते हुए, भविष्य के उभारों की रणनीति तैयार करना, यानि कार्यक्रम के लिए संघर्ष को आगे ले जाना.

प्रश्न: स्तालिनवादी, जनता के बीच काम करने का जो दावा करते हैं, उस पर आपको क्या कहना है?
वर्कर सोशलिस्ट'जनता के बीच काम' और 'ज़मीनी काम' के स्तालिनवादियों के इन फर्जी दावों के बीच, धुर दक्षिणपंथी शक्तियां बिना किसी प्रतिरोध के ही सत्ता में आ गई हैं. इसने इन तमाम फर्जी दावों की पोल खोल दी है. स्तालिनवादी, वास्तव में ‘अर्थवादी’ हैं. उनके नेता और पार्टियां, ट्रेड-यूनियनों पर आधारित हैं. ‘जनता के बीच काम’ के बहाने ये क्रान्तिकारी राजनीतिक संघर्ष से, कार्यक्रम के लिए संघर्ष से, बहुत पहले ही किनारा कर चुके हैं. पूंजी-प्रतिष्ठान से तालमेल बैठाते हुए, इन नेताओं ने खुद को ट्रेड-यूनियनों के भीतर ब्यूरोक्रेसी के तौर पर संगठित कर लिया है. जनता उनके लिए मोटे चंदे उगाहने और भीड़ एकत्र करने का साधन भर है.

प्रश्न: मगर स्तालिनवादियों का कहना है कि वे जनता के बीच काम के साथ-साथ राजनीतिक संघर्ष में भी हिस्सा लेते हैं.
वर्कर सोशलिस्ट: जनता के बीच उनके काम पर हमने ऊपर रौशनी डाली है. आइये अब उनके राजनीतिक संघर्ष के दावे की भी परीक्षा करें. जैसा हमने कहा, मार्क्सवादियों के लिए राजनीतिक संघर्ष की धुरी है- क्रान्तिकारी कार्यक्रम के लिए संघर्ष. मगर स्तालिनवादी नेता और उनके कार्यकर्त्ता इस संघर्ष में कोई हिस्सा नहीं लेते. इसे वे हवाई काम मानते हैं. दूसरी पार्टियों के कार्यक्रम पढ़ना-समझना और बहस करना तो दूर, ये अपनी पार्टी के कार्यक्रम तक को कभी नहीं पढ़ते. कार्यक्रम उनके लिए महज एक औपचारिकता है.

प्रश्न: मगर वे ज़मीनी काम की बात करते हैं, धरने प्रदर्शन करते हैं.
वर्कर सोशलिस्ट: वे 'अर्थवाद' को ज़मीनी काम कहते हैं. लेनिन ने इन अर्थवादियों की आलोचना करते कहा है कि ये वही काम करते हैं जो जनता इनके बिना भी सुचारू रूप से कर सकती है. आइये इस ‘ज़मीनी काम’ को करीब से देखें. दिल्ली में जंतर-मंतर पर होने वाले ‘प्रदर्शन’, इस ज़मीनी काम का क्लासिकल खाका पेश करते हैं. इन प्रदर्शनों की लिखित पूर्वसूचना पहले पुलिस को दी जाती है. पुलिस पेयजल सहित सभी जरूरी व्यवस्था करती है. फिर पुलिस द्वारा नियत एकांत स्थान पर पुलिस बैरिकेडों के बीच जिंदाबाद-मुर्दाबाद होता है. एक आध बैरिकेड गिराने के बाद गिरफ़्तारी दी जाती है और फिर ज़मीनी काम की इतिश्री होती है. इसी बीच नेता अखबार, टीवी वालों को बयान देने और अपने चेहरे चमकाने के चक्कर में रहते हैं.

प्रश्न: स्तालिनवादी यह भी दावा करते हैं कि वे लाखों सदस्यता वाले जन-संगठनों का नेतृत्व करते हैं?
वर्कर सोशलिस्ट: कौन से जन-संगठन? जिन संगठनों की ये नेता बात करते हैं, वे जन-संगठन नहीं, इनकी पार्टियों के कठपुतली संगठन हैं. सीटू, एटक, एक्टू, इफ्टू, एस.एफ़.आई, ए.आई.एस.एफ़, आइसा, इनमें से कोई भी जन-संगठन नहीं है. सब पार्टियों के घोड़े हैं. जन-संगठन, जनता को संगठित करता है, न कि विसंगठित. इन संगठनों ने तो मजदूरों और युवाओं को दर्जनों टुकड़ों में बांटकर विसंगठित कर डाला है और पूंजी के विरुद्ध एकजुट आक्रमण को असंभव बना दिया है. जन-संगठनों के नाम पर सैकड़ों दुकानें खोल दी गई हैं, जिनमें ट्रस्ट और व्यावसायिक प्रकाशन तक शामिल हैं. स्तालिनवादी ब्यूरोक्रेट इन संगठनों को, मजदूरों और युवाओं को घेरे रखने के लिए भेड़ों के बाड़ों की तरह प्रयोग कर रहे हैं. किसी भी संघर्ष के वक़्त, एकजुट होने की जगह ये संगठन उस संघर्ष पर अपना झंडा गाड़ने के लिए एक-दूसरे के खिलाफ ही लड़ते हुए, संघर्ष की धार को नष्ट कर देते हैं. यह बिखराव, सर्वहारा और युवा आन्दोलन की प्रगति की राह में बड़ी बाधा बना हुआ है. हम इस बिखराव के खिलाफ मजदूरों, युवाओं को सचेत करते हैं और उनका आह्वान करते हैं कि वे इस बिखराव को नकारते हुए, इन सगठनों और झूठे नेताओं की ओर पीठ करें और पूंजीवाद पर सांझे हमले के लिए एकजुट हों.

प्रश्न: मगर जनता के व्यापक हिस्सों पर नियंत्रण तो स्तालिनवादियों के नेतृत्व वाले इन संगठनों का ही है न? तो आप क्रांति को नेतृत्व कैसे दे सकते हैं?
वर्कर सोशलिस्ट: जैसा हमने कहा कि ये 'जन-संगठन' जनता के संगठन न होकर ब्यूरोक्रेसी के घोड़े हैं. इन संगठनों का जो सीमित आधार सर्वहारा, युवाओं और मेहनतकश जनता के पिछड़े व्यापक हिस्सों के बीच मौजूद है, उसे फंदे की तरह इस्तेमाल करते हुए, स्तालिनवादी नेता, इन पिछड़े हिस्सों और वर्ग-सचेत अग्रणी हिस्सों के बीच दीवार बनकर खड़े हैं, जिसने इन व्यापक हिस्सों को क्रान्तिकारी कार्यक्रम की ओर मुड़ने से बार-बार रोका है. इस सीमित आधार के मौजूद होने की भी वजह यह है कि शांतिकाल में मेहनतकश जनता के व्यापक हिस्से, राजनीतिक प्रश्नों की ओर उदासीन रहते हैं और आम तौर से बूर्ज्वा नेतृत्व और राजनीति की ओर उन्मुख रहते हैं. वे उदारवादी, सुधारवादी, मध्यमार्गी पार्टियों के पीछे आँख मूंदे चलते रहते हैं. मगर ठीक संकट के बीचों-बीच क्रान्तिकारी परिस्थिति जन्म लेती है, और इसके साथ ही ये हिस्से पर्त-दर-पर्त तेज़ी से क्रांति की ओर आकर्षित होते हैं. यह वक़्त होता है जब क्रान्तिकारी पार्टियों को व्यापक जन-समर्थन मिलता है. शांतिकाल में क्रान्तिकारी पार्टी को इस क्रान्तिकाल के लिए तैयारी करनी होती है, सर्वहारा और युवाओं के अग्रणी तत्त्वों को क्रान्तिकारी कार्यक्रम से सज्जित करना होता है और उनसे अपनी कतारों को गुंजान बनाना होता है.

प्रश्न: क्या आपकी पार्टी के कोई जन-संगठन या जन-आन्दोलन मौजूद हैं?
उत्तर: पार्टी के जन-संगठन, जन-आन्दोलन? जन-संगठन या जन-आन्दोलन तो जनता के संगठन या जनता के आन्दोलन होते हैं और पार्टी संगठन का एकमात्र स्वरुप खुद पार्टी होती है. पार्टी को जन संगठन और आन्दोलन का अग्रिम दस्ता बनने के लिए संघर्ष करते रहना चाहिए. मगर जन-संगठन या जन-आन्दोलन पार्टी के संगठन कैसे हो सकते हैं? दरअसल, जन-संगठनों या आंदोलनों पर पार्टी का बैनर टांगना, ब्यूरोक्रेटिक संकीर्णता और अनंत अवसरवादिता का परिणाम है, जो जन-संगठन और आन्दोलन की व्यापकता को संकुचित करके, उसे ब्यूरोक्रेसी का घोड़ा बना देता है. यह बात ही बेतुकी है कि मजदूरों, युवाओं के बीच दर्जनों झंडे-बैनर वाले ये संगठन एक-दूसरे की ओर पीठ करके खड़े रहें और वर्ग-शत्रु पर हमले के लिए युवाओं-मेहनतकशों को एकजुट करने के बजाय आपस में ही भिड़ते रहें. ये संगठन, वास्तव में, मेहनतकश जनता को एकजुट करने के बजाय, उसे एकजुट होने से रोक रहे हैं, उसके बीच दर्जनों ही नहीं, सैंकड़ों दीवार खड़ी कर दी गई हैं, जिन पर रंग-बिरंगे झंडे टांग दिए गए हैं. मजदूरों के बीच सीटू, एटक, इफ्टू, और छात्रों युवाओं के बीच एस.ऍफ़.आई., ए.आई.एस.ऍफ़, आइसा, डी.एस.ओ. और ऐसे ही दर्जनों बड़े संगठनों के अलावा सैंकड़ों छोटे-छोटे संगठन मौजूद हैं, जो प्रतिदिन और आगे विभाजित हो रहे हैं. इनके बीच मजदूरों-युवाओं को ज्यादा से ज्यादा विभाजित करने और उन पर अपने-अपने ब्यूरोक्रेटिक  फंदे कसने की होड़ लगी हुई है. ये संगठन मेहनतकश जनता की एकता को बाधित करते हुए, ब्यूरोक्रेटिक संकीर्णता की नग्न झांकी प्रस्तुत करते हैं. वर्कर सोशलिस्ट इस पूरी नीति के विरुद्ध हैं और मेहनतकशों-युवाओं की एकता के समर्थक हैं. वे जनता के आन्दोलन, संगठन पर अपना झंडा लहराने की ब्यूरोक्रेटिक कवायद की जगह, अग्रणी युवाओं-मजदूरों को क्रान्तिकारी कार्यक्रम से लैस करने में जुटे हैं.

प्रश्न: मगर मुट्ठी भर अग्रणी तत्त्वों को शिक्षित-दीक्षित कर देने से तो क्रांति नहीं हो सकती. क्रांति का स्रोत तो व्यापक जनता ही है, उसे शिक्षित करना होगा.
वर्कर सोशलिस्ट: पहली बात तो यह कि व्यापक जनता को शिक्षित करने का सिवा इसके और क्या रास्ता हो सकता है कि जनता की अग्रिम कतारों को सबसे पहले शिक्षित किया जाय और फिर वे अपेक्षाकृत पिछड़े हिस्सों को शिक्षित करें? ‘वर्कर सोशलिस्ट’ ठीक यही काम कर रहे हैं. दूसरी बात, आपका यह कहना गलत है कि व्यापक जनता क्रांति का स्रोत है. ऐतिहासिक विकास में, आदमी की चेतना यथास्थितिवादी रही है, न कि क्रान्तिकारी. मगर इतिहास इस चेतना को बलात विज्ञान और तकनीक की उपलब्धियों का पीछा करने के लिए बाध्य करता है और यथास्थितिवाद की जकड़ को बलपूर्वक तोड़ देता है. इसी प्रक्रिया में ‘चेतना’ का बारम्बार क्रांतिकरण होता रहा है. इसका अर्थ यह है कि जनता के पिछड़े हिस्से क्रांति का चुनाव नहीं करते, बल्कि अंतिम विकल्प के रूप में ही उसकी ओर मुड़ने को बाध्य होते हैं.

प्रश्न: तब मेहनतकश जनता के व्यापक संस्तर कैसे क्रान्तिकारी पार्टी की ओर उन्मुख होंगे?
वर्कर सोशलिस्ट: जीवन के व्यावहारिक अनुभवों से सीखते हुए और एक के बाद दूसरे विकल्पों को आजमाते और नकारते, ये पिछड़े संस्तर, क्रान्तिकारी विकल्प के चुनाव से बचने के तमाम प्रयासों के बावजूद, अंततः, और अधिकतर अपनी इच्छा के विरुद्ध, एकमात्र शेष विकल्प- क्रान्ति- की ओर मुड़ने को बाध्य होते हैं.

प्रश्न: तो क्या पिछड़े हिस्सों को शिक्षित करने की जरूरत नहीं है?
वर्कर सोशलिस्ट: पिछड़े हिस्से किताबों, सिद्धांतों, कार्यक्रमों से नहीं सीखते. वे अपने जीवन के अनुभव से सीखते हैं. अनुभव-जन्य ज्ञान ही मुख्य रूप से उनका निर्देशन करता है. जीवन के इस अनुभव को हम नहीं बल्कि हमारे शत्रु, पूंजीपति, जो सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक जीवन के नियंता होते हैं, प्रभावित करते हैं. ये उन्हीं की कार्रवाईयां हैं जो जनता को क्रांति की ओर धकेलती हैं. इस प्रक्रिया में वह ऊष्मा पैदा होती है जो पुराने समाज और सत्ता को ध्वस्त कर देने के लिए आवश्यक है. हाल ही में मध्य-पूर्व के विद्रोहों में यह ऊष्मा बड़े पैमाने पर उत्सर्जित हुई, मगर क्रान्तिकारी कार्यक्रम से निदेशित सर्वहारा पार्टी के अभाव ने इस ऊष्मा का अपव्यय हो जाने दिया. इतिहास में यह सैंकड़ों बार हुआ है. ‘जनता जनता’ पुकारते स्तालिनवादी नेता उन असफलताओं का, जिनके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं, दोष, मेहनतकश जनता के सिर मढ़ना चाहते हैं. जबकि सच यह है कि पिछली सदी में ‘जनता’ तो बारम्बार क्रांति की ओर मुड़ी है, मगर स्तालिनवादियों के क्रांति-विरोधी कार्यक्रम ने उसे हर बार क्रांति की राह से विरत कर दिया है. इसलिए हमारा कार्यभार ‘ज़मीनी काम’ और ‘जनता-जनता’ की बांग देते रहना नहीं है, न ही जन-संगठनों के नाम पर भीड़ एकत्र करते रहना है, बल्कि क्रान्तिकारी कार्यक्रम और उसके चारों ओर उस पार्टी की रचना करना है जो इस ऊष्मा को क्रान्तिकारी ऊर्जा में बदल सके.

प्रश्न: तो क्या क्रान्तिकारी मार्क्सवादी पार्टी के लिए जनता के व्यापक हिस्सों के साथ चलना आवश्यक नहीं?
वर्कर सोशलिस्ट: बिलकुल नहीं! मार्क्सवादी कार्यक्रम से निर्दिष्ट क्रान्तिकारी पार्टी, जनता की मनोगत स्थिति और समझ की नहीं, बल्कि उसके वस्तुनिष्ठ हितों की प्रतिनिधि होती है. पार्टी, जनता के पीछे नहीं, बल्कि जनता, पार्टी के पीछे चलती है. क्रान्तिकारी इतिहास ऐसे सैंकड़ों उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब क्रान्तिकारी मार्क्सवादी पार्टियों ने जनता की चेतना और समझ से ठीक उलट अवस्थिति ली. उदाहरण के लिए, प्रथम विश्व-युद्ध के समय जब सर्वहारा और मेहनतकशों के व्यापक हिस्से अपनी बूर्ज्वा सरकारों के समर्थन में खड़े थे, क्रान्तिकारी मार्क्सवाद की पार्टियां- रूस में बोल्शेविक और जर्मनी में स्पार्टकस लीग- इस युद्ध के विरोध में, अपनी-अपनी बूर्ज्वा सरकारों के विरोध में, सामने आईं.


प्रश्न: क्या बिना गारे-पानी, के भवन निर्माण संभव है? अर्थात क्या बिना जनता के क्रांति संभव है?
उत्तर:  बिना गारे-पानी के भवन निर्माण असंभव है और बिना जनता के क्रांति. मगर जिस तरह गारा-पानी जमा कर लेने मात्र से भवन निर्माण नहीं हो सकता, उसी तरह जनता को जमा कर लेने से क्रांति नहीं हो सकती. भवन निर्माण के लिए सबसे पहले जरूरत है डिज़ाइन, साईट प्लान की और क्रांति के लिए उसके क्रान्तिकारी कार्यक्रम की. डिज़ाइन के बिना भवन निर्माण और कार्यक्रम के बगैर क्रांति नहीं हो सकती. उस आर्किटेक्ट को आप क्या कहेंगे जो बिना साईट प्लान तैयार किए ही शहर भर में ढिंढोरा पिटवा दे कि गारा-पानी जमा किया जाय. दरअसल, गारा-पानी एकत्र करने का काम, यानि जनता को तैयार करने का काम, कुल योजना का प्रथम नहीं, अंतिम चरण है. सबसे पहले, न सिर्फ डिज़ाइन, यानि कार्यक्रम तैयार होना चाहिए, बल्कि आर्किटेक्ट और इंजीनियरों के बीच, यानि राजनीतिक नेताओं के बीच, उस पर सहमति होनी चाहिए. सहमति हासिल करने के लिए अलग-अलग डिज़ाइन, कार्यक्रमों में संघर्ष अनिवार्य है. चूंकि भवन निर्माण और क्रांति दोनों ही अनेक डिज़ाइन या कार्यक्रम के चलते संभव नहीं हैं और एक डिज़ाइन, कार्यक्रम की अपेक्षा करते हैं, इसलिए एक डिज़ाइन यानि कार्य्रकम के लिए संघर्ष अनिवार्य है. मार्क्सवाद का कुल इतिहास, इसी राजनीतिक संघर्ष का इतिहास है. मगर अर्थवाद के पैरोकार, स्तालिनवादी और माओवादी दोनों ही डिज़ाइन, कार्यक्रम और उसके लिए संघर्ष के महत्त्व को नगण्य समझते हैं और सिर्फ गारा-पानी एकत्र करने को ही अपना दायित्व समझते हैं, यही इनके लिए ज़मीनी काम है, शेष सब हवाई. इसलिए वे हमारे संघर्ष को समझने में असमर्थ हैं. 

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