Saturday, 25 January 2014

नक्सलबाड़ी का किसान संघर्ष और उसके सबक


राजेश त्यागी / २५.१.२०१४

नक्सलबाड़ी का किसान संघर्ष, भारत में माओवाद की पहली प्रयोगशाला थी, जिसने माओवाद और उसके ‘चीनी रास्ते’ के दिवालियापन को पूरी तरह उजागर करते हुए दिखा दिया कि चीन की क्रांति से माओवादियों ने जो निष्कर्ष निकाले थे, वे पूरी तरह गलत थे.

चीन में माओवाद का उदय और विकास, सीधे-सीधे १९२५-२७ की चीनी क्रांति में सर्वहारा के पराभव के साथ जुडा हुआ है, जिसे, स्टालिन द्वारा निर्देशित कोमिन्टर्न की बोगस नीतियों के चलते, चीनी सर्वहारा पर जबरन लाद दिया गया था.

स्तालिनवादी कोमिन्टर्न की ये नीतियां, चीन की राष्ट्रीय बूर्ज्वाजी के क्रान्तिकारी होने की झूठी मेन्शेविक परिकल्पना पर टिकी थीं. इन नीतियों ने १९२५-२७ की चीनी क्रांति में सर्वहारा को बाध्य किया कि वह अभूतपूर्व वीरता और बलिदानों के बल पर छीनी गई, राजनीतिक सत्ता, बूर्ज्वा कोमिनतांग के हवाले कर दे और उसके सामने आत्मसमर्पण करे, और इस तरह, बूर्ज्वा कोमिनतांग के पीछे बांधकर, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को उसकी निशक्त बांदी बना दिया. इसके चलते च्यांग काई शेक ने हजारों कम्युनिस्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं, युवाओं और मजदूरों का कत्लेआम करते हुए, चीनी सर्वहारा को बिलकुल किनारे लगा दिया और नंगे आतंक और दमन का राज कायम किया.


इस दमन के शुरू होते ही माओ त्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी का एक गुट, जो बूर्ज्वा कोमिनतांग के दक्षिण पक्ष में सक्रिय था और स्टालिन की मेन्शेविक नीति का अंध-समर्थक था, शंघाई और केंटन से भाग निकला और जान बचाने के लिए, सुदूर ग्रामीण अंचल में जाकर शरण ली. जहां चेन-तु-शिउ और पेंग-शु-त्से जैसे शीर्ष कम्युनिस्ट नेताओं ने ईमानदारी से स्टालिन की नीतियों की कड़ी आलोचना की, वहीं माओ ने यह निष्कर्ष निकाला कि चीन में सर्वहारा क्रांति के रास्ते सत्ता नहीं ले सकता, कि राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग क्रान्तिकारी शक्ति है और कि सर्वहारा को किसानो के साथ-साथ राष्ट्रीय पूंजीपतियों और निम्न पूंजीपतियों के साथ भी मिलकर मोर्चा बनाना  होगा. इस मोर्चे को माओ ने ‘चार वर्गों का मोर्चा’ कहा.

शहरों और औद्योगिक सर्वहारा की तरफ पीठ फेर लेने के बाद, माओवादियों ने सुदूर अंचलों में किसानो को संगठित करते उन्ही के बीच पार्टी और सशस्त्र दस्तों को संगठित करना शुरू किया. अक्टूबर क्रांति की विरासत और लाल झंडे को इस्तेमाल करते हुए, माओवादियों ने कम्युनिस्ट पार्टी के मर्म, उसके सर्वहारा अंतर्य से पूरी तरह काट दिया. आम हड़ताल और सशस्त्र विद्रोह की उस नीति को उलटते हुए, जिसके जरिये शांघाई में क्रान्तिकारी सर्वहारा ने मार्च १९२६ में ही सत्ता छीन ली थी, माओवादियों ने अपनी गतिविधियाँ किसान-युद्ध पर संकेंद्रित कीं.

कोमिनतांग द्वारा चलाये गए ‘घेरो और नष्ट करो’ अभियानों के तहत माओ की सैनिक रणनीति का पूरी तरह दिवाला निकल गया जबकि वह किसान सशस्त्र दस्तों का बारहवां हिस्सा भी नहीं बचा पाया और ‘आधार इलाके’ छोड़कर, पहाड़ों की तरफ भागना पड़ा.

इसी बीच, दूसरे विश्व युद्ध में १९४५ में, जापान की हार हुई और च्यांग के संरक्षक, अमेरिका के साथ स्टालिन का तेहरान में समझौता हो गया. रूसी फौजें मंचूरिया में दाखिल हुईं और कोमिन्तंग को ताइवान निकल जाने का सुरक्षित रास्ता देते हुए, और सर्वहारा को किनारे रखते हुए, माओ के किसान दस्तों ने १९४९ में चीन पर नियंत्रण कर लिया. यह था माओ का ‘चीनी रास्ता’.

‘चीनी रास्ते’ का अर्थ था: (१) किसानी देशों में सर्वहारा अशक्त है और वह सत्ता लेकर अपना अधिनायकत्व स्थापित नहीं कर सकता. (२) पिछड़े देशों में राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग क्रान्तिकारी है और वह क्रान्ति का मित्र है. (३) इन देशों में क्रांति के लिए चार वर्गों-पूंजीपति, निम्न-पूंजीपति, किसान और सर्वहारा का संयुक्त मोर्चा बनाना होगा. (४) इससे पहले कि सर्वहारा अपनी सत्ता स्थापित करे, उसे ‘बूर्ज्वा गणराज्य’ के एक समूचे दौर से गुजरते हुए, पूँजीवाद का विकास करना होगा.

इसी चीनी रास्ते को, जो चीन में बुरी तरह निष्फल रहा था, और जिसने चीन में सत्ता, सर्वहारा के बजाय निम्न-पूंजीवादी माओवादी ब्यूरोक्रेसी के हाथ में दे दी थी, भारत में १९६७ में लागू किया गया. भारत में भी यह उसी तरह पिटा.

एक ऐसे किसान युद्ध के लिए, जो सर्वहारा क्रान्ति का खतरा उत्पन्न नहीं करता था, चीन की माओवादी ब्यूरोक्रेसी का समर्थन और सहयोग, किसी क्रान्तिकारी उद्देश्य के बजाय, उसके राष्ट्रीय हितों से ज्यादा प्रेरित था. पाकिस्तान में जनरल याहया खां की मजदूर-किसान विरोधी, फौजी तानाशाही को जनतांत्रिक बताने वाला माओ, भारत के बूर्ज्वा लोकतंत्र को फर्जी बता रहा था. भारत के उस वक़्त सोवियत शिविर में होने की वजह से, चीनी ब्यूरोक्रेसी भारत के भीतर ऐसे विप्लव में अपना हित देखती थी. कुछ ही वर्षों में माओ की यह क्रान्तिकारिता तब खुलकर सामने आ गयी, जब १९७२ में ठीक विएतनाम पर अमेरिकी बमबारी के बीच, माओ ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को न सिर्फ चीन के राजकीय दौरे पर आमंत्रित किया बल्कि अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार और सैनिक सहयोग के दरवाजे खोल दिए और सोवियत रूस को दुनिया का सबसे बड़ा शत्रु घोषित करते हुए, अमेरिका को बरी कर दिया.

चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में सीपीआई (एम) से अलग हुए माओवादियों ने, बिना गहन राजनीतिक शोध और विश्लेषण, ‘चीनी रास्ते’ को ‘इलाके के आधार पर सत्ता दखल’ 'वर्ग शत्रु के सफाए' और ‘बन्दूक एकत्र करो अभियान’ के नारों के तहत प्रस्तुत किया. सर्वहारा आन्दोलन को ट्रेड यूनियन आन्दोलन समझते हुए, और किसान वर्ग और आदिवासियों को क्रांति की मुख्य शक्ति बताते हुए, खुद माओ के निर्देशन और सहमति से सशस्त्र-युद्ध का रास्ता लिया गया. पश्चिम बंगाल के एक गाँव नक्सलबाड़ी में पहला हमला किया गया.

'चीनी रास्ते’ की माओवादियों की यह गलत समझ, क्रान्तिकारी मार्क्सवाद-लेनिनवाद और अक्टूबर क्रांति के निष्कर्षों के ठीक उलट थी. सर्वहारा की स्वतंत्र और नेतृत्वकारी भूमिका को रेखांकित करते हुए, मार्च १९१७ में लेनिन ने लिखा था, “पेत्रोग्राद में मजदूर प्रतिनिधियों की सोवियत, सैनिकों और किसानो से तथा खेतिहर मजदूरों से, विशेष रूप से और सबसे पहले पश्चोक्त से, जी हाँ किसानों से भी पहले खेतिहर मजदूरों से, सम्बन्ध स्थापित कर रही है”. लेनिन ने लिखा, “मजदूर प्रतिनिधियों की सोवियतें और किसान प्रतिनिधियों की सोवियतें, यह है हमारा सबसे तात्कालिक कार्यभार. इस सम्बन्ध में हम न सिर्फ खेतिहर मजदूरों की अलग सोवियतें बनायेंगे, बल्कि सम्पत्तिहीन और सबसे गरीब किसानो को भी संपन्न किसानो से अलग संगठित करेंगे”. लेनिन फिर जोर देते हुए लिखते हैं, “इस सम्बन्ध में ग्रामीण इलाकों में मजदूर प्रतिनिधियों की सोवियतों का - दूसरे किसान प्रतिनिधियों की सोवियतों से अलग, दिहाड़ीदार मजदूरों  की विशेष सोवियतों का- तुरंत संगठन, तात्कालिक कार्यभार के रूप में सामने आता है".  वहीँ, ठीक इसके पचास साल बाद, भारत में खेतिहर मजदूरों के किसानो से अलग और स्वतंत्र संगठन का विरोध करते हुए, माओवादी नेता, चारू मजूमदार लिखते हैं, “खेतिहर मजदूरों का अलग संगठन, हमारे उद्देश्य में सहायक नहीं होगा. उल्टा खेतिहर मजदूरों का अलग संगठन अर्थवाद पर आधारित ट्रेड-यूनियन प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है और किसानो के साथ टकराव को गहरा करता है”.

यह स्पष्ट करता है कि ‘चीनी रास्ते’ की माओवादी समझ कैसे सीधे-सीधे सर्वहारा और उसकी स्वतंत्र और नेतृत्वकारी भूमिका की विरोधी है और इसलिए क्रांति की भी विरोधी है, चूंकि सर्वहारा का स्वतंत्र संगठन और क्रान्तिकारी आन्दोलन पर उसका नेतृत्व, जो क्रांति के बाद उसके एकल वर्ग अधिनायकत्व में बदल जायगा, क्रांति की सफलता की अनिवार्य शर्त है.

अब तक भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन पर स्तालिनवादियों का नियंत्रण था, मगर स्टालिन की मृत्यु और ख्रुश्चेव द्वारा की गई आलोचना के बाद इनमें विखंडन तेज हो रहा था. १९६४ में विभाजन के बाद अब दूसरा विभाजन तैयार था. स्तालिनवादियों का भारत में काला इतिहास है. स्टालिन के सीधे निर्देश पर उन्होंने न सिर्फ ब्रिटिश शासकों का साथ दिया, और उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन का खुला विरोध किया, बल्कि १९४७ में भारतीय उपमहाद्वीप के सांप्रदायिक विभाजन का भी समर्थन किया. १९४८ में तेलंगाना में संक्षिप्त हिस्सेदारी के बाद स्टालिन के निर्देश पर ही स्तालिनवादियों ने इसकी अति-वामपंथी विचलन बताकर आलोचना की थी. १९४७ के बाद स्टालिनवादी, नेहरु की बूर्ज्वा सरकार को प्रगतिशील और जनवादी बता रहे थे और फिर वे इंदिरा सरकार का समर्थन कर रहे थे.

ईमानदार और जुझारू कार्यकर्ता या तो स्तालिनवादी पार्टियों में शामिल नहीं थे, या फिर दिग्भ्रमित थे या कसमसा रहे थे. स्टालिनवादी पार्टियाँ, क्रान्ति की जनवादी मंजिल के नाम पर बूर्ज्वाजी के साथ मज़बूत तालमेल बनाये बैठी थीं और सर्वहारा सत्ता के लिए संघर्ष करने से इस आधार पर इंकार कर रही थीं कि भारत में पहले ‘जनवादी क्रांति’ का दौर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी होगी.

ऐसे में, निष्क्रिय स्तालिनवादी नेताओं के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठाकर, माओवादियों ने हजारों ईमानदार और जुझारू कार्यकर्ताओं को ललकारा और इन कार्यकर्ताओं ने, जिनमें अधिकतर नौजवान थे, इसका समर्थन किया. बूर्ज्वा संसदवाद के जिस दलदल में स्टालिनवादी पार्टियाँ, क्रान्तिकारी आन्दोलन को घसीट ले गई थीं, क्रांतिमना युवाओं को इस आह्वान में, उससे बाहर निकलने की उम्मीद नजर आई.

नक्सलबाड़ी ने ‘आर्थिक निश्चयवाद’ से उपजे इस मिथक को तोड़ दिया कि पूँजीवाद का विकास क्रांति के जनवादी कार्यभारों को हल करता है. इसने दिखा दिया कि पिछड़े देशों में पूँजीवाद का यह विशिष्ट विकास, जनवादी कार्यभारों को हल नहीं करता, बल्कि उन्हें और भी उलझा देता है और गहरा बना देता है और अंतर्विरोधों का समाधान करने के बजाय उन्हें चरम पर पहुंचा देता है. इसने दिखाया कि भारत में पूँजीवाद के विकास के साथ कृषि में संकट और भी विकराल रूप ले रहा है और लंबित ‘भूमि-सुधारों’ के साथ-साथ अब ग्रामीण बेरोज़गारी और भी विकराल समस्या के रूप में सामने आ रही है, कि १९४७ में भारत में स्थापित हुई बूर्ज्वा सत्ता, कृषि सुधारों, जाति उत्पीडन, राष्ट्रीय समस्या, सहित दूसरे तमाम जनवादी कार्यभारों को न तो हल कर पाई है, न कर सकती है, कि पिछड़े देशों में ‘जनवादी गणराज्य’ बस ऐसा ही हो सकता है, कि जनवादी कार्यभार केवल सर्वहारा सत्ता ही हल कर सकती है.

मगर माओवादी नेता इसे समझने में अक्षम रहे. वे एक ओर तो ‘बूर्ज्वा गणराज्य’ की स्थापना और दूसरी ओर कृषि क्रांति को गांवों के भीतर संपन्न किये जाने की मरीचिका पाले रहे और दूसरी ओर राष्ट्रीय सर्वहारा आन्दोलन के बजाय, ‘स्थानीय सत्ता दखल’ पर जमे रहे, चूंकि किसान आन्दोलन इसके पार नहीं जा सकता. वे यह समझने में असमर्थ रहे कि कृषि-क्रांति का निपटारा जंगल और गाँव में नहीं, बल्कि दिल्ली और दूसरे बड़े शहरों में पूंजीपति वर्ग और सर्वहारा की सीधी टक्कर में होगा. किसान-युद्ध इसमें महत्वपूर्ण मगर द्वितीयक भूमिका अदा करेंगे. सर्वहारा को किसान आन्दोलन की दुम समझते हुए, शहरी मजदूरों के कार्यभार के बारे में चारू लिखते हैं, “मजदूरों के अगुवा लोग सशस्त्र संघर्ष में हिस्सा लेने गाँव में जायेंगे. यह मजदूर वर्ग का प्रमुख कार्यभार है: ‘हथियार जमा करो और ग्रामीण इलाकों में सशस्त्र संघर्ष के लिए आधार इलाके तैयार करो’. यह है मजदूर वर्ग की राजनीति, सत्ता छीनने की राजनीति”.
 
साठ के दशक का अंत समूची दुनिया में पूंजीवाद के संकट का दौर था, जिसमें मजदूर और मेहनतकश जनता पूँजीवाद के विरुद्ध उद्वेलित थी. एक वास्तविक क्रांति की शुरुआत की सभी पूर्वावस्थाएँ मोजूद थीं.

मगर यह नया माओवादी नेतृत्व राजनीतिक रूप से अत्यंत अशक्त था और उन चुनौतीपूर्ण कार्यभारों को संपन्न करने में अक्षम था, जो ऐतिहासिक परिस्थिति ने प्रस्तुत किये थे. ‘कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की संयोजन समिति’ के नाम से जिस पार्टी  का गठन हुआ था, उसका राजनीतिक स्तर, चारू मजूमदार के प्रसिद्ध ‘आठ दस्तावेजों’ को पढने से ही पता चल जाता है. यह क्रान्ति के उसी पुराने “दो चरण” वाले फार्मूले के साथ चिपका हुआ था जिसे यह नेतृत्व “चीनी रास्ता” समझता था. इसने यह तो कहा कि क्रांति का रास्ता संसद से नहीं, सशस्त्र संघर्ष से होकर जाता है, मगर राजनीतिक रूप से यह उसी मेन्शेविक कार्यक्रम से जुड़ा रहा, जिसे अक्टूबर क्रांति सकारात्मक रूप से और चीनी क्रांति नकारात्मक रूप से निरस्त कर चुकी थी. वर्ग शत्रुओं को चिन्हित करते भी यह उस पुराने विश्लेषण से आगे नहीं गया और साम्राज्यवाद-सामंतवाद को दुश्मन ठहराते, राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग को क्रान्ति का सहकारी समझता रहा. परिणामतः, सर्वहारा को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने और पार्टी में कतारबद्ध करने के बजाय, गाँवों में सशस्त्र संघर्ष की वकालत की गई और सर्वहारा नेतृत्व का प्रश्न बस लफ्फाज़ी तक ही सीमित रहा. माओवादी नेतृत्व का मुंह किसान वर्ग की ओर, और पीठ सर्वहारा की ओर रही. वे यह समझने में असमर्थ रहे कि किसान वर्ग, पूँजीवाद की नहीं, बल्कि प्राक-पूंजीवादी, मध्ययुगीन उत्पादन प्रणाली की उपज है, जिसे पूंजीवाद ने अस्थायी रूप से समाहित तो कर लिया है मगर उसका एक वर्ग के रूप में कोई भविष्य नहीं है.

भारत सहित दुनिया भर का इतिहास, किसान-युद्धों से भरा पड़ा है. मगर इन किसान युद्धों का अंत हर बार या तो किसान विद्रोहों की पराजय में या एक आततायी की जगह दूसरे आततायी के सत्ता में आ जाने के साथ हुआ है. किसान इन आततायियों के सत्ता संघर्ष में सिर्फ तोपों का चारा भर रहा है. यह ऐतिहासिक सिलसिला सदियों तक चला, जब तक पूँजीवाद और परिणामतः सर्वहारा अस्तित्व में नहीं आ गया. सर्वहारा में किसान वर्ग को वह नेता मिला, जिसके नेतृत्व में पहली बार आतताइयों और शोषकों की तमाम जमातों को- ज़मींदारों, साहूकारों और पूंजीपतियों को- चुनौती देना और उनके शासन को उलटकर वर्ग-विहीन समतामूलक समाजवादी समाज का निर्माण संभव हो पाया. इसे समझने में नाकाम, गाँव और किसान की तरफ मुंह किये माओवादी नेता, नरोदनिकों की तरह, इतिहास में पीछे की तरफ देख रहे थे.

अक्टूबर क्रांति ने दिखा दिया था कि पिछड़े देशों में भी किसान वर्ग राष्ट्रीय स्तर पर संगठित हो पूँजी के शासन को नहीं उलट सकता, कि किसान या तो बूर्ज्वा या सर्वहारा के पीछे ही चल सकता है, कि किसान वर्ग की भूमिका कभी भी नेतृत्वकारी या स्वतंत्र नहीं हो सकती, कि गाँव शहर का नेतृत्व नहीं कर सकता, कि क्रांति के लिए किसानो को सर्वहारा के पीछे लामबंद होना होगा, कि सर्वहारा और किसानो के बीच इस एकता का आधार पूंजीपतियों-जमींदारों के खिलाफ उनका सांझा विरोध होगा और यह सर्वहारा के एकल वर्ग अधिनायकत्व की धुरी पर टिका होगा. इस निष्कर्ष को भूल जाने के कारण ही रूस में फरवरी १९१७ में असफलता मिली, तो चीन में १९२५-२७ की क्रांति असफल हुई. १९४९ में माओवादी ब्यूरोक्रेसी, चीनी सर्वहारा को हाशिये पर धकेलकर सत्ता में आई.

रूसी क्रांति के महान नेता लिओन ट्रोट्स्की ने दिखाया था कि पिछड़े देशों में क्रान्ति, यूरोप की तरह दो चरणों में नहीं बंटी होगी, साम्राज्यवाद के दौर में दोनों चरण -जनवादी और समाजवादी- एक ही सर्वहारा क्रांति में गुंथे होंगे और यह क्रांति सर्वहारा के एकल वर्ग अधिनायकत्व के तहत संपन्न होगी. लेनिन की अप्रैल थीसिस और रूसी क्रांति के वास्तविक विकास ने ट्रोट्स्की के इस विश्लेषण का अनुमोदन किया.

माओवाद, चीनी क्रांति ही नहीं रूसी क्रांति की भी गलत स्टालिनवादी-मेन्शेविक समझ पर आधारित है. यह गलत समझ फरवरी को जनवादी और अक्टूबर को समाजवादी क्रांति मानती है और रूसी क्रांति के सतत प्रवाह को दो चरणों में बांटकर देखती है और इसी आधार पर गलत निष्कर्ष पर पहुँचती है कि सर्वहारा का अधिनायकत्व समाजवादी क्रांति में कायम होगा, जिससे पहले जनवादी क्रांति संपन्न होगी. जनवादी क्रांति की यह मरीचिका, स्टालिन और माओ के सहयात्रियों को सर्वहारा के अधिनायकत्व के विरुद्ध खड़ा कर देती है. हमने बार-बार दिखाया है कि स्टालिन-बुखारिन जैसे बोल्शेविक और मेन्शेविक नेताओं की इस गलत समझ से ही रूसी क्रान्ति फरवरी में फलीभूत नहीं हो पाई, चूंकि वे सर्वहारा के अधिनायकत्व के विरुद्ध थे और उन्होंने बूर्ज्वा सरकार को स्वेच्छा से सत्ता दे दी थी. लेनिन की अप्रैल थीसिस, जो ट्रोट्स्की के ‘सतत क्रांति’ के सिद्धांत पर आधारित थी, ने बोल्शेविक पार्टी को ‘सर्वहारा अधिनायकत्व’ की ओर पुनर्निर्देशित किया और अक्टूबर में सर्वहारा ने यह अधिनायकत्व स्थापित करके, न सिर्फ रुकी हुई जनवादी क्रांति को परिचालित किया बल्कि साथ ही समाजवादी कार्यभारो को भी संबोधित किया.

स्टालिन और माओ ने रूस और चीन की क्रान्तियों से ऐसे निष्कर्ष निकाले जो गलत थे मगर उनके निहित स्वार्थों की पूर्ति करते थे, उनके राजनीतिक दुष्कृत्यों पर पर्दा डालते थे और उन्हें महिमामंडित करते थे. इन नेताओं ने स्टालिन और माओ की किताबों से पढ़कर रट तो लिया मगर वे यह देखने में असमर्थ रहे कि चीन और रूस के रास्ते को अलग करते हुए, स्टालिन और माओ ने सर्वहारा क्रांति के सर को ही उसके धड़ से अलग कर दिया था.

मार्क्सवादी आन्दोलन के राजनीतिक पुनर्निर्देशन, और युवाओं, मजदूरों को अक्टूबर क्रांति के सबकों से सशस्त्र किये जाने का महत्वपूर्ण कार्यभार सामने था. मगर माओवादी नेताओं ने इसे दरकिनार कर, बन्दूकें जमा करने और ‘वर्ग शत्रु के सफाए’ के नाम पर, सत्ता पर सीधे आक्रमण का प्रस्ताव किया. चारू ने कहा कि देश और प्रदेश में नहीं तो गाँव में ही शत्रु पर आक्रमण करो. किसान-युद्ध के लिए यह रणनीति सही थी, मगर एक पार्टी जो मार्क्सवादी होने का दावा कर रही थी, उसके लिए बिलकुल गलत. पार्टी का काम था किसान संघर्षों को राष्ट्रीय स्तर पर संघनित और फलीभूत करने के लिए बड़े शहरों में सर्वहारा को लामबंद और आंदोलित करना, और क्रान्तिकारी सर्वहारा आन्दोलन की धुरी के गिर्द, सैंकड़ों नक्सलबाड़ी संगठित होने देना. पार्टी का काम था नक्सलबाड़ी को दिशा देना, उसे रास्ता दिखाना, मगर दिग्भ्रमित माओवादी नेताओं ने ‘नक्सलबाड़ी’ को ही ‘एकमात्र रास्ता’ बताना शुरू कर दिया. यह ऐसा रास्ता था जो हमें रूस और चीन की क्रांतियों के सही निष्कर्षों से दूर ले जाता था.

नक्सलबाड़ी के किसान संघर्ष की चिनगारी बड़े शहरों में युवाओं और मजदूरों तक पहुंची जरूर, और वे बड़े पैमाने पर आंदोलित भी हुए, मगर माओवादी नेताओं ने, उनकी ‘चीनी पथ’ की विलोम थीसिस ने, इस चिंगारी को विस्फोट में बदलने से रोक दिया. माओवादियों ने क्रांति को सर के बल खड़ा कर दिया- शहर गाँव और जंगल के पीछे चलेगा और सर्वहारा किसान और आदिवासी के! उलटी गंगा पहाड़ पर!
 
माओवादी पूर्वाग्रहों में फंसे ये नेता मजदूर आन्दोलन के क्रान्तिकारी कोण को देखने में असमर्थ, उसे ‘अर्थवादी’ ‘ट्रेड-यूनियनवादी' आन्दोलन बताते रहे. सर्वहारा की उस जादुई शक्ति को जो हाथ हिलाकर पूंजीवाद के चक्के को जाम कर सकती है, ये नेता समझने में नाकाम रहे. भारत की पूंजीवादी सत्ता की तुलना, बीती सदी में यूरोप की पूंजीवादी सत्ताओं से करते हुए, ये इस वाहियात निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि भारत में सत्ता पूंजीवादी नहीं बल्कि सामंती और साम्राज्यवाद की दलाल है. पूंजीपति वर्ग के तमाम हिस्सों ने जिस तरह नक्सलबाड़ी के किसान विद्रोह का विरोध किया और उसके दमन के समर्थन में एकजुटता दिखाई, उसने स्टालिन-माओ की इस मेन्शेविक शिक्षा की सारहीनता को, कि पूंजीपति-वर्ग के राष्ट्रीय-जनवादी हिस्से क्रांति के पक्षधर हैं, और स्पष्ट कर दिया. 

दरअसल, माओवादी नेताओं का कद और उनका निम्न-बूर्ज्वा कार्यक्रम, वास्तविक क्रान्ति के कार्यभारों के समकक्ष नहीं थे.

आन्दोलन पर दमन शुरू होते ही, माओवादी नेता भाग खड़े हुए. विनोद मिश्र के नेतृत्व में बड़े हिस्से ने आन्दोलन की ही आलोचना करते हुए, वापस बूर्ज्वा संसदवाद की ओर रुख किया और उसमें धंसकर रह गया. सीपीआई एम.एल. लिबरेशन के बैनर से सक्रिय यह पार्टी किसी भी अर्थ में स्टालिनवाद की शेष दोनों पार्टियों, सीपीआई और सीपीएम से अलग नहीं है, जिनसे उसके नेता अलग हुए थे. कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया (सी.एल.आई.) के नाम से बनी, नक्सलबाड़ी के भगोड़ों की दूसरी पार्टी के राजनीतिक पतन की तो हद ही हो गई. सी.एल.आई ने सशस्त्र संघर्ष छोड़ने का यह बहाना बनाया कि जिस जनवादी क्रांति के लिए सशस्त्र संघर्ष किया जाना था, उसके कार्यभार तो ६० के दशक में, यानि नेहरु सरकार के नेतृत्व में संपन्न कर लिए गए हैं और क्रांति अपने दूसरे चरण -समाजवादी क्रान्ति- में दाखिल हो चुकी है. सी.एल.आई कितने ही गुटों में बिखर गई, जो अब पार्टी की जगह तरह-तरह के एन.जी.ओ., ट्रस्ट, प्रतिष्ठान, प्रकाशनों जैसे उपक्रमों में लगे हैं.  माओवादियों की एकमात्र बची पार्टी- सीपीआई (माओवादी) जो कई गुटों के विलय से बनी है, और कमोबेश 'चीनी रास्ते' के पुराने मेन्शेविक कार्यक्रम का अनुसरण करती है, आज किसी मजदूर-किसान आन्दोलन का प्रतिनिधित्व नहीं करती. यह पार्टी किसी न किसी बूर्ज्वा पार्टी के साथ चिपकी रही है, जिनमें झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, तेलुगु देशम, कांग्रेस, बसपा आदि शामिल हैं. पश्चिम बंगाल में इस पार्टी ने पिछले विधान-सभा चुनावों में खुलकर तृणमूल कांग्रेस के लिए प्रचार किया था और उसे सत्ता में लाने में इसकी अहम भूमिका थी. 'चीनी रास्ते' की इस माओवादी समझ का अनुसरण करने वाली दूसरी छोटी पार्टियाँ और ग्रुप भी पराजय, विखंडन और हताशा के बीच क्षरित हो रहे हैं.

स्तालिनवादी-मेन्शेविक कार्यक्रम पर टिका, माओवाद का यह उपक्रम, जो रूस और चीन की क्रांतियों की भ्रांतिपूर्ण समझ पर आधारित है, भारत में ही नहीं, बल्कि इंडोनेशिया से नेपाल, और लैटिन अमेरिका से अफ्रीका तक, दुनिया के तमाम हिस्सों में, इसी तरह मुंह के बल गिरा. 

भारत में जनवादी क्रांति के कार्यभार, जिन्हें नक्सलबाड़ी आन्दोलन ने रेखांकित तो किया, मगर अपने माओवादी-स्तालिनवादी-मेन्शेविक नेतृत्व और कार्यक्रम के चलते, सुलझाने में असमर्थ रहा, उसके बाद से लगातार उलझते ही नहीं गए हैं, बल्कि ये अनसुलझे विरोध और तीखे होते गए हैं. पूंजीवाद के विकास ने इन विरोधों को और नए विरोधों के साथ गूंथ दिया है, जिन्हें भविष्य की सर्वहारा क्रांति, जो विश्व समाजवादी क्रांति का हिस्सा है, सर्वहारा अधिनायकत्व के तहत एक अटूट और सतत क्रान्तिकारी प्रक्रिया में हल करेगी.

1 comment:

  1. कृप्या किसानो के दृष्टिकोण को नजरंदाज न करे, जिन्हे ना माओ या स्टेलिन या कोई और से नही सिर्फ अपने भुमि, मौलिक अधिकार इत्यादि की चिन्ता है

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