Wednesday, 21 January 2009

छब्बीस जनवरी पर मेहनतकश अवाम के नाम अपील

पूंजीवादी गणतंत्र के भ्रमजाल को तोड़, सर्वहारा समाजवादी गणतंत्र की स्थापना के लिए एकजुट हों!

साथियों,

विश्व पूंजीवाद के मौजूदा संकट के चलते हताशा और चिंता से घिरे भारत के पूंजीवादी शासक, इस बार गणतंत्र की रस्म अदायगी, आनेवाले महाविनाश की आशंका और भय के बीच करेंगे। पूंजीवाद की जिस बर्बर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर वे अब तक इतराते रहे, वह दुनिया भर में ख़ुद अपने ही बोझ तले दम तोड़ने के कगार पर है। संकट से बदहवास हुए ये शासक पूंजीवाद के ‘ग्लोबल एजेंडे’ को भूलकर, अपने-अपने घरोंदों को बचाने में जुट गए हैं। संकट के इस दौर में इन्होने अपना पूरा ध्यान कारपोरेट दुनिया को ‘बेल आउट' करने पर केंद्रित कर दिया है। कारपोरेट ठगों को पहले तो सार्वजनिक धन पर हाथ साफ़ करने की खुली छूट दी गई, और अब संकट के वक़्त उन्हें ‘बेल आउट' पैकेज बांटे जा रहे हैं, जिनमें सार्वजानिक धन पानी की तरह बहाया जा रहा है। संकट के इस भंवर में, मेहनतकश जनता को न सिर्फ़ उसके भाग्य के सहारे छोड़ दिया गया है, बल्कि उसके संभावित आक्रोश से निपटने के लिए बाकायदा कवायद की जा रही है। पूंजीवादी गणतंत्रों की नाकामी से मेहनतकश जनता के मोहभंग और तेजी से पनपते रोष से निपटने के लिए, दुनिया के पूंजीपति आज गणतंत्र का राग छोड़कर, फासिस्ट और सैनिक तानाशाही थोपने की तैयारी में लग गए हैं। पूंजीवादी सरकारें अपनी जनता पर दमनचक्र चलाने के लिए, एक के बाद एक काले कानून लादने में जुट गई हैं। विश्व पूंजीवाद के नेता, अमेरिका ने अपनी सुरक्षा सेनाओं को चौकस करते हुए निर्देश जारी किए हैं कि वे आने वाले समय में उन संभावित आतंरिक उथल-पुथल से निपटने की तैयारी करें, जो इस संकट के चलते अमेरिकी जनता की तरफ़ से पैदा हो सकती हैं। आर्थिक संकट, पहले से कहीं ज्यादा तेजी से और स्पष्टता के साथ पूंजीवादी गणतंत्रों के जनविरोधी चरित्र की पोल खोल रहा है, और यह प्रमाणित कर रहा है कि पूंजीवादी ‘गणतंत्र’ सिर्फ़ और सिर्फ़ पूंजीपतियों का तंत्र है, एक ऐसा तंत्र जो मेहनतकश जनता पर पूंजीपतियों की सत्ता और शिकंजे को सुनिश्चित बनाता है, जो पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ लडाई में सर्वहारा के हाथ बाँध देता है, जो सिर्फ़ धनकुबेरों की मदद के लिए सामने आता है, मेहनतकश जनता की लूट में उनकी मदद करता है और जरूरत पड़ने पर मेहनतकशों को कुचल डालता है। पूंजीपतियों के लिए ‘बेल आउट’ और मेहनतकशों के लिए 'दमन', यह है इन पूंजीवादी गणतंत्रों का वास्तविक सार। पूंजीपतियों का यह ‘गणतंत्र’, मेहनतकश जनता के खिलाफ, मुट्ठी भर खरबपतियों की नंगी तानाशाही के अलावा और कुछ भी नहीं है। ये पूंजीवादी गणतंत्र दुनिया को जो कुछ दे सकते थे, एक सदी पहले ही दे चुके। अब इनके पास दुनिया को देने के लिए भूख, बेकारी, भ्रष्टाचार, काले कानूनों, दमन और बर्बरता के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा है। इन पूंजीवादी गणतंत्रों में, दुनिया को लूटने, बांटने और अपना दबदबा कायम करने को लेकर अंतहीन कलह मची है, जो दुनिया को निश्चित रूप से तीसरे विश्व युद्ध की तरफ़ धकेल रही है। अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों ने पूरी दुनिया पर एक अघोषित मगर स्थाई युद्ध पहले ही थोप दिया है। आज दुनिया भर में फैले ये तथाकथित गणतंत्र मिलकर सिर्फ़ साम्राज्यवाद का झंडा ऊंचा करते हैं। इन पूंजीवादी गणतंत्रों के भीतर, जहाँ एक तरफ़ दुनिया की मेहनतकश जनता, पूँजी के मालिकों की अथाह लूट, लालच और बर्बरता की मार झेल रही है, वहीं दूसरी तरफ़ दौलत के अम्बार इस कदर लग गए हैं कि समूची अर्थव्यवस्था ही इसके बोझ से चरमरा गई है। भारत जैसे पिछडे और खेतिहर देशों में तो मेहनतकश जनता पूंजीवाद के इस जुए के नीचे और भी बुरी तरह पिस रही है। देहात में यदि क़र्ज़ और भूख की मार से परेशान किसान आत्महत्या कर रहे हैं, तो शहरों में बड़ी तादाद में मजदूर छंटनी और बेकारी भुगत रहे हैं। उधर ‘सत्यम कम्प्यूटर्स’ जैसी कंपनियों की आड़ में पूंजीपति और नौकरशाह मिलकर अरबों के घोटाले कर रहे हैं, जबकि इनके दलाल शासक बेशर्मी से ‘गणतंत्र’ का ढोल पीट रहे हैं। विश्व पूँजीवाद, पिछली एक शताब्दी से गल-सड़ रहा है, इसका चौतरफा पतन हो रहा है. रूसी क्रांति ने लगभग एक सदी पहले ही इसका मृत्यु-मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया था, मगर मजदूर आन्दोलन के गद्दार नेतृत्व और नकली समाजवादियों के घातक प्रभाव के चलते, जिनमें स्तालिनवादी और माओवादी नेतृत्व शामिल हैं, मरणासन्न पूंजीवाद को कृत्रिम साँसे मिल गईं। इन रंगे सियारों ने, पहले सामाजिक-जनवाद और फिर स्टालिनवाद-माओवाद के झंडे तले, पूरी एक शताब्दी, विश्व पूंजीवाद की डटकर सेवा की और उसके पिट्ठू बने रहे. मार्क्सवाद की खाल ओढे, इन अवसरवादियों ने, मजदूरों और युवाओं की कम से कम दो पीढियों को भ्रमित कर, पूंजीवाद के खिलाफ क्रांतिकारी संघर्ष से विरत कर दिया। इन्होने न सिर्फ़ रूस में अक्टूबर क्रांति की जड़ खोद डाली, बल्कि चीन, स्पेन, ईरान, ईराक, और भारत समेत शेष दुनिया के कितने ही हिस्सों में परिपक्व होती हुई क्रांतियों को तबाह कर डाला। नेपाल का क्रांतिकारी उभार, इन अवसरवादियों का ताज़ा शिकार है। इस बोगस नेतृत्व ने, न सिर्फ़ सर्वहारा क्रांति की विश्व पार्टी, कोमिन्तर्ण को दिशाहीन बना दिया, बल्कि इसके जरिये विभिन्न देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों को और सर्वहारा को, उन देशों में पूंजीपतियों का दुमछल्ला बना दिया और इस तरह उसे अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी चेतना से और विश्व सर्वहारा क्रांति के एजेंडे से विमुख कर दिया। विगत आधी सदी से भी ज्यादा समय में इन रंगे सियारों की कारगुजारियों ने इन्हें पूरी तरह नंगा करके रख दिया है। आज न तो इनके हाथ सरकारें बची हैं, न कारगर पार्टियाँ। विश्व सर्वहारा क्रांति के एजेंडे को तिलांजलि देकर, इन्होने पूरी तरह विश्व पूंजीवाद के साथ अपनी पटरी बैठा ली है। भारत में पिछले छह दशकों से चल रही ‘गणतंत्र’ की इस नौटंकी के पीछे, इस झूठे और नकली नेतृत्व की मिलीभगत एक महत्त्वपूर्ण कारक रही है। सर्वहारा को भटकाने और उसके क्रांतिकारी आवेग को रोके रखने के लिए, पूंजीवादी शासक इस झूठे सर्वहारा नेतृत्व का, जिसमें स्तालिनवादी और माओवादी दोनों शामिल हैं, बखूबी इस्तेमाल करते रहे हैं। ये दोनों ही भारत में ‘राष्ट्रीय पूंजीपति’ वर्ग के एक हिस्से को प्रगतिशील, क्रांतिकारी बताते हैं और उसके साथ मिलकर सत्ता लेना चाहते हैं। ये दोनों ही क्रांति के जनवादी और समाजवादी कार्यभारों को दो अलग अलग मंजिलों में बांटकर क्रांतिकारी आन्दोलन को बेदम और नाकारा बना रहे हैं। अवसरवाद के इन पैरोकारों के विरुद्ध संघर्ष किए बिना और सर्वहारा आन्दोलन को इनके जहरीले प्रभाव से मुक्त किए बिना, विश्व पूंजीवाद पर निर्णायक प्रहार तो दूर, उसके खिलाफ कोई कारगर संघर्ष तक नहीं किया जा सकता। पूंजीवाद पर ऐतिहासिक जीत हासिल करने की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त है- सर्वहारा का क्रांतिकारी नेतृत्व, यानी सर्वहारा की स्वतंत्र और क्रांतिकारी पार्टी, जो न सिर्फ़ पूंजी से, बल्कि साथ ही इसके अंगरक्षकों- स्टालिनवाद और माओवाद के दुष्प्रभाव से भी मुक्त हो। भारत में गणतंत्र के पूंजीवादी ढकोसले को सिरे से खारिज करते हुए, हम सर्वहारा से यह मांग करते हैं की वह झूठे गणतंत्र की आड़ में चल रहे ‘धनतंत्र’ को उलटकर, सच्चे सर्वहारा गणतंत्र की स्थापना के लिए आगे बढे, जो पूंजीपतियों के नहीं, बल्कि सर्वहारा के अधिनायकत्व पर टिका हो.पूंजीवादी गणतंत्रों के पतन और संकट का यह दौर, समाजवादी क्रांतियों की नई पूर्ववेला है। क्रांतियों की नई लहर पूंजीवादी गणतंत्रों को बहा ले जायेगी और मानवजाति को भूख, बेकारी, लूट, शोषण, अपराध, युद्ध और हिंसा से हमेशा-हमेशा के लिए निजात दिलाएगी.

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